बार-बार अग्रिम ज़मानत याचिकाएं दायर करना प्रक्रिया का दुरुपयोग, इससे मुक़दमेबाज़ी महज़ जुआ बनकर रह जाती है: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-20 09:51 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कम समय के अंतराल पर बार-बार अग्रिम ज़मानत याचिकाएं दायर करने की प्रथा पर नाराज़गी ज़ाहिर की। कोर्ट ने कहा कि अग्रिम ज़मानत का उपाय, जिसका मकसद किसी आरोपी की निजी आज़ादी को पहले से ही सुरक्षित रखना है, उसे महज़ एक जुआ बनाकर नहीं रखा जा सकता।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच द्वारा पारित आदेश रद्द किया। इस आदेश में प्रतिवादी-आरोपी को उसकी लगातार तीसरी याचिका पर अग्रिम ज़मानत दी गई थी। कोर्ट ने पाया कि पिछली दो अग्रिम ज़मानत याचिकाएं दो महीने के भीतर ही खारिज हो गई थीं, जिसके तुरंत बाद तीसरी याचिका दायर की गई थी।

कोर्ट ने कहा,

"इस तरह से लगातार एक के बाद एक अग्रिम ज़मानत याचिकाएं दायर करना—यानी तीन महीनों में तीन याचिकाएं—उस कानूनी प्रक्रिया को, जिसका मकसद योग्य मामलों में किसी व्यक्ति की निजी आज़ादी को पहले से ही सुरक्षित रखना है, महज़ एक जुआ बनाकर रख देता है। यह प्रक्रिया के दुरुपयोग से कम कुछ भी नहीं है।"

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक 75 वर्षीय माँ (शिकायतकर्ता-अपीलकर्ता) द्वारा अपने बेटे और बहू पर लगाए गए आरोपों से जुड़ा है। माँ ने उन पर धोखाधड़ी करने और पारिवारिक संपत्ति की बिक्री से मिली रकम का गबन करने का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि एक 'समझौता विलेख' (Settlement Deed) के ज़रिए पारिवारिक संपत्तियां अपने नाम करवाने के बाद आरोपियों ने उन्हें विकास कार्यों के नाम पर 11 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन बेचने के लिए उकसाया और ज़मीन की बिक्री से मिली रकम के बारे में उन्हें गलत जानकारी दी। उनके अनुसार, जहां उनके बैंक खाते में सिर्फ़ लगभग ₹9.65 करोड़ दिखाए गए, वहीं असल में ज़मीन कहीं ज़्यादा ऊँची कीमत पर बेची गई थी और आरोपियों ने उसमें से एक बड़ी रकम का गबन कर लिया था।

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि आरोपियों ने उन्हें बुढ़ापे में सहारा देने का वादा करके उनका घर भी बेटे के नाम करवा लिया था, लेकिन बाद में उन्हें बेसहारा छोड़ दिया और घर से बाहर निकाल दिया। उनकी शिकायत के आधार पर IPC की धारा 406 और 420, और माता-पिता और सीनियर सिटीजन्स का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 24 के तहत एक FIR दर्ज की गई।

आरोपियों ने शुरू में सेशंस कोर्ट में अग्रिम ज़मानत मांगी, जिसने जुलाई 2025 में उनकी अर्ज़ी खारिज की। मद्रास हाईकोर्ट में उनकी बाद की अग्रिम ज़मानत याचिकाएं भी अगस्त 2025 में इस आधार पर खारिज कर दी गईं कि जांच अभी शुरुआती चरण में थी और हिरासत में पूछताछ ज़रूरी थी।

हालांकि, एक महीने के भीतर ही आरोपियों ने हाईकोर्ट की दूसरी बेंच के सामने एक नई अग्रिम ज़मानत याचिका दायर की। पहले ज़मानत खारिज होने के आदेश के बावजूद, हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 में उन्हें अग्रिम ज़मानत दी और इस मामले को रियल एस्टेट सौदे से जुड़ा विवाद मान लिया। इस आदेश में न तो पहले ज़मानत खारिज होने के बारे में कोई चर्चा की गई और न ही यह जांचा गया कि क्या परिस्थितियों में कोई ऐसा बदलाव आया था, जिसके आधार पर उन्हें राहत दी जा सके।

अग्रिम ज़मानत मिलने के बाद आरोपियों ने FIR रद्द करवाने के लिए भी एक याचिका दायर की। साथ ही आगे की कानूनी कार्यवाही पर अंतरिम रोक भी हासिल कर ली। अग्रिम ज़मानत दिए जाने के इस फैसले को चुनौती देते हुए, शिकायतकर्ता/अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

फैसला

अपील को मंज़ूर करते हुए कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस फैसले को गलत ठहराया, जिसमें उसने तीसरी अग्रिम ज़मानत याचिका को बिना सोचे-समझे (mechanically) सिर्फ़ इसलिए मंज़ूर कर लिया था, क्योंकि उसने इस विवाद को दीवानी (civil) प्रकृति का मान लिया था; जबकि पहली नज़र में यह ज़मीन के धोखाधड़ी भरे हस्तांतरण का मामला लग रहा था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने इस बात का ज़िक्र नहीं किया कि पहले ज़मानत याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं, और न ही उसने यह देखा कि क्या परिस्थितियों में कोई ऐसा बड़ा बदलाव आया था, जिसके आधार पर वह आरोपियों के पक्ष में अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल कर सके।

कोर्ट ने कहा,

"...माननीय जज ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि हाईकोर्ट की ही एक दूसरी बेंच ने 04.08.2025 को आरोपियों की ज़मानत याचिका खारिज की थी। इसलिए उन्होंने इस मुद्दे पर विचार करना भी ज़रूरी नहीं समझा कि क्या परिस्थितियों में कोई ऐसा बदलाव आया था, जिसके आधार पर कोई अलग फैसला लिया जा सके।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने आरोपियों को अग्रिम ज़मानत देकर गलती की। उसने इस विवाद को गलत तरीके से दीवानी मामला मान लिया, जबकि पहली नज़र में यह 'आपराधिक विश्वास भंग' (Criminal Breach of Trust) और 'धोखाधड़ी' (Cheating) जैसे अपराधों के सभी ज़रूरी तत्वों को पूरा करता हुआ प्रतीत हो रहा था।

अदालत ने यह टिप्पणी की,

“हमारी राय है कि यह ऐसा मामला नहीं था जिसमें हाई कोर्ट को आरोपी को अग्रिम ज़मानत देनी चाहिए थी, यह मानकर कि यह महज़ एक रियल एस्टेट का कारोबार है जिसमें ज़मीन की कीमत को लेकर विवाद था। यह मामला उससे कहीं ज़्यादा गंभीर था और इस पर उस विचार से कहीं ज़्यादा गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए था, जितना कि माननीय न्यायाधीश ने आरोपी को राहत देते समय किया।”

Cause Title: Vasantha versus State of Tamil Nadu and others

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