शैक्षणिक संस्थानों में आवारा कुत्तों को खिलाना है तो डॉग-बाइट की जिम्मेदारी भी लें : सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-20 07:31 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के प्रबंधन से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि शैक्षणिक संस्थानों में पशु कल्याण समूह (Animal Welfare Groups) या छात्र संगठन तभी आवारा कुत्तों को खाना खिला सकते हैं या उनकी देखभाल कर सकते हैं, जब वे परिसर में किसी भी डॉग-बाइट या संबंधित नुकसान की कानूनी जिम्मेदारी लेने का औपचारिक हलफनामा (Affidavit) दें।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने कहा कि आवारा कुत्तों के अधिकारों और संरक्षण को मानव जीवन एवं सुरक्षा से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई छात्र संगठन या पशु कल्याण समूह परिसर में आवारा कुत्तों की देखभाल करना चाहता है, तो उसे संस्थान प्रमुख के समक्ष यह लिखित आश्वासन देना होगा कि किसी भी हमले या नुकसान की स्थिति में वह कानूनी दायित्व वहन करेगा।

अदालत ने चेतावनी दी कि इस निर्देश का पालन नहीं होने पर संबंधित संस्थान प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।

यह फैसला हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ की ओर से दाखिल आवेदन पर आया। विश्वविद्यालय ने अदालत से अनुरोध किया था कि उसके Animal Law Centre द्वारा चलाए जा रहे आवारा कुत्तों के Capture-Sterilise-Vaccinate-Release (CSVR) मॉडल को जारी रखने की अनुमति दी जाए।

विश्वविद्यालय ने दलील दी कि यह मॉडल नसबंदी, टीकाकरण और जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए मानवीय तरीके से आवारा कुत्तों के प्रबंधन का प्रयास है।

सुप्रीम कोर्ट ने NALSAR को सीमित अपवाद (Limited Exception) देते हुए प्रयोगात्मक आधार पर इस मॉडल को जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन यह शर्त लगाई कि Animal Law Centre को विश्वविद्यालय के कुलपति के समक्ष यह undertaking देनी होगी कि यदि परिसर में किसी व्यक्ति को आवारा कुत्ते के कारण नुकसान पहुंचता है, तो संस्था टॉर्टियस लायबिलिटी (Tortious Liability) का सामना करेगी।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आवारा कुत्तों के संरक्षण से जुड़ी किसी भी व्यवस्था में जवाबदेही (Accountability) का स्पष्ट सिद्धांत होना आवश्यक है। केवल पशु अधिकारों की बात कर मानव सुरक्षा की अनदेखी नहीं की जा सकती।

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