भारत-यूके समझौते के तहत भारतीय अदालत में स्थानांतरित कैदी सजा में छूट की मांग कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूनाइटेड किंगडम से भारत स्थानांतरित किया गया कैदी, जो अपनी सजा काट रहा है, वह भारतीय नियमों के तहत सजा में छूट (रेमिशन) की मांग कर सकता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि 'सजा पाए व्यक्तियों के हस्तांतरण पर भारत-यूके समझौते' के अनुच्छेद 10(2) में 'अन्य कानून' (Other Laws) शब्द का उल्लेख है, जिसके अंतर्गत सजा में छूट देने का अधिकार भी आता है।
जस्टिस एम.एम. सुंदेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें अपीलकर्ता गुरमेज सिंह को समय से पहले रिहा करने से इनकार कर दिया गया था। गुरमेज सिंह को 2012 में यूनाइटेड किंगडम में हत्या के मामले में दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी, जिसमें कम से कम 35 साल जेल में बिताना अनिवार्य था।
यूके की अदालत ने अपीलकर्ता को दोषी ठहराया था, जिसके बाद 'सजा पाए व्यक्तियों के हस्तांतरण पर भारत-यूके समझौते' के तहत उसे भारत स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू हुई। मई 2015 में उसे भारत लाया गया और वह अपनी बाकी की सजा पंजाब में काट रहा है।
14 साल की जेल पूरी करने के बाद अपीलकर्ता ने समय से पहले रिहाई के लिए आवेदन किया। हालांकि, केंद्र सरकार ने दोनों देशों के बीच हुए समझौते का हवाला देते हुए उसका आवेदन खारिज किया।
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराया और कहा कि उसे यूके की अदालत द्वारा सुनाई गई सजा की पूरी अवधि काटनी होगी। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने 'हरजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य और अन्य' मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि किसी विदेशी अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए और सजा पाए व्यक्ति को भारतीय कानूनों के तहत सजा में छूट (रेमिशन) पाने से रोका नहीं जा सकता।
अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता के तर्क को सही माना। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 10(2) केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि वह भारत में लागू कानूनों के अनुसार सजा में माफी, एमनेस्टी (आम माफी) या सजा को कम करने (कम्यूटेशन) का फैसला ले सकती है।
अदालत ने कहा,
“भारत-यूके समझौते के अनुच्छेद 10(2) को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि दोनों में से कोई भी देश अपने संविधान या अन्य कानूनों के अनुसार, क्षमादान, माफी या सजा में बदलाव (कम करने) की सुविधा दे सकता है। 'अन्य कानूनों' में निश्चित रूप से वे कानून भी शामिल होंगे जो सजा में छूट (Remission) से संबंधित हैं... इसका मतलब यह नहीं है कि दोषसिद्धि (Conviction) में कोई बदलाव किया जा रहा है, बल्कि सजा में छूट की नीति के तहत केवल सजा को कम किया जा रहा है। जब तक राज्य के पास यह अधिकार है, तब तक इसे भारत-यूके समझौते के अनुच्छेद 10 में उल्लिखित 'अन्य कानूनों' के दायरे में माना जाएगा।”
परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की गई और केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया कि वह आठ सप्ताह के भीतर, लागू 'सजा में छूट' (Remission) नीति के अनुसार अपीलकर्ता के मामले पर पुनर्विचार करे।
Case Title : GURMEJ SINGH VERSUS UNION OF INDIA & ORS.