सार्वजनिक व्यवस्था के उल्लंघन का कोई सबूत न होने पर निवारक हिरासत बेवजह: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-17 17:28 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में MPDA Act 1981 के तहत जारी निवारक हिरासत आदेश रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि जब किसी व्यक्ति पर सामान्य कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती हो और सार्वजनिक व्यवस्था के उल्लंघन को दिखाने वाला कोई ठोस सबूत न हो, तो निवारक हिरासत कानून का इस्तेमाल करना बेवजह है।

कोर्ट ने कहा,

"हमारी राय में हिरासत में लेने वाले अधिकारी की यह संतुष्टि कि अपीलकर्ता की गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए हानिकारक थीं, उसका कोई वास्तविक आधार नहीं है। इसके अलावा, जहां किसी व्यक्ति पर देश के सामान्य कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती हो, वहां सार्वजनिक व्यवस्था के उल्लंघन को दिखाने वाले ठोस सबूतों की गैर-मौजूदगी में निवारक हिरासत कानूनों के तहत शक्ति का इस्तेमाल करना उचित नहीं है।"

इन टिप्पणियों के साथ जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने अपीलकर्ता को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया (जब तक कि किसी अन्य मामले में उसकी ज़रूरत न हो)।

संक्षेप में मामला

अपीलकर्ता को महाराष्ट्र खतरनाक गतिविधियों की रोकथाम (झुग्गी-झोपड़ी मालिकों, शराब तस्करों, नशीली दवाओं के अपराधियों, खतरनाक व्यक्तियों, वीडियो पाइरेट्स, रेत तस्करों और आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी में लगे व्यक्तियों) अधिनियम, 1981 (MPDA Act) की धारा 31(1) और 31(2) के तहत जारी 13.10.2025 के एक आदेश के अनुसार हिरासत में लिया गया था। आदेश के अनुसार, अपीलकर्ता एक्ट की धारा 2(p) के अर्थ में एक "शराब तस्कर" था और उसके खिलाफ सामान्य कानून के तहत कार्रवाई अपर्याप्त थी। इसके अलावा, उसे सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक शराब तस्करी की गतिविधियों में शामिल होने से रोकने के लिए उसे हिरासत में लेना आवश्यक था।

हिरासत के आधारों में उसके खिलाफ दर्ज 5 मामलों की एक सूची शामिल थी, जिनमें से 2 मामलों में जांच चल रही थी और 3 मामलों में मुकदमा चल रहा था। दो हालिया मामले, जो हिरासत आदेश का आधार बने, महाराष्ट्र निषेध अधिनियम, 1949 के तहत थे। अपीलकर्ता को इनमें से किसी भी मामले में गिरफ्तार नहीं किया गया। 2024 में MPDA Act के तहत उसके खिलाफ इसी तरह की कार्रवाई का प्रस्ताव था, लेकिन उसे रद्द कर दिया गया।

शुरुआत में, अपीलकर्ता ने हिरासत आदेश के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उसने दलील दी कि उसकी गिरफ्तारी के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। फिर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि उसकी कथित गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक थीं। यह भी तर्क दिया गया कि जब इस मामले को देश के सामान्य कानूनों के तहत ही निपटाया जा सकता था, तो निवारक हिरासत कानून (preventive detention law) लागू करने का कोई आधार नहीं था।

इस साल फरवरी में हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज की। इससे असंतुष्ट होकर उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

राज्य सरकार ने अपीलकर्ता की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि वह नकली शराब (ताड़ी) बेचने के धंधे में लिप्त था। वह पहले भी ऐसी गतिविधियों में शामिल रहा था, लेकिन हाल के दो मामलों के बाद अधिकारियों ने उसे हिरासत में रखने का सोच-समझकर फैसला लिया।

दोनों पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने अपीलकर्ता को गिरफ्तार नहीं किया। हिरासत आदेश में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि उसकी गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक थीं।

"सिर्फ यह कह देना काफी नहीं है कि अपीलकर्ता की गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में बाधा डाल रही थीं। यह दिखाने के लिए ठोस सबूत होने चाहिए कि अपीलकर्ता की गतिविधियों ने वास्तव में सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ा है... हिरासत के कारणों में यह कहीं नहीं बताया गया कि अपीलकर्ता द्वारा सप्लाई की गई नकली ताड़ी पीने से लोग बीमार पड़े, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था में खलल पैदा हुआ हो। इसके अलावा, ऐसा कोई सबूत भी नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि अपीलकर्ता के खिलाफ दर्ज मामलों के सिलसिले में उसे गिरफ्तार करने की कोई कोशिश की गई।"

कोर्ट ने 'अर्जुन बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। यह भी एक ऐसा ही मामला था, जिसमें अपीलकर्ता को गिरफ्तार करने की कोई कोशिश नहीं की गई और निवारक हिरासत आदेश को गलत ठहराया गया।

आखिरकार, अपील स्वीकार करते हुए और हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

"सिर्फ कुछ घिसे-पिटे और दोहराए जाने वाले शब्दों का इस्तेमाल कर देना काफी नहीं है—जैसा कि 1981 के कानून में अक्सर देखने को मिलता है। जब तक कोई ठोस सबूत न हो जिससे यह साबित हो सके कि अपीलकर्ता की हानिकारक गतिविधियों के कारण सार्वजनिक व्यवस्था में कोई खलल पड़ा है, तब तक 1981 के कानून की धारा 3(1) के तहत निवारक हिरासत में रखना उचित नहीं है।"

Case Title: VIDYAWANT v. THE STATE OF MAHARASHTRA, Crl.A. No. 2495/2026

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