सड़कों पर आवारा पशु 'प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर' नहीं, हादसों के पीड़ितों को मुआवजा दें राज्य: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-07-31 11:37 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में सड़कों और राजमार्गों पर घूम रहे आवारा मवेशियों से होने वाले हादसों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि राज्य सरकारों को ऐसे मामलों में पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था करनी चाहिए।

अदालत ने केंद्र और राज्यों से मौजूदा कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने तथा आवारा पशुओं की समस्या के स्थायी समाधान के लिए व्यापक तंत्र विकसित करने का भी आग्रह किया।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा,

"आवारा मवेशी राष्ट्रीय राजमार्गों, सड़कों और गलियों में मनमाने ढंग से खड़े किए गए प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर नहीं हैं।"

पीठ ने यह टिप्पणी पंजाब के संगरूर में वर्ष 2007 में एक आवारा सांड के हमले में व्यक्ति की मौत से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की।

अदालत ने कहा कि मवेशियों से जुड़े सड़क हादसे अब अपवाद नहीं रह गए हैं। सड़कों और राजमार्गों पर घूम रहे आवारा पशु इंसानों के साथ-साथ स्वयं पशुओं के जीवन के लिए भी गंभीर खतरा बन चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि हाल के वर्षों में हर साल 1,300 से अधिक लोगों की मौत पशुओं के हमलों के कारण हुई। इसलिए इस समस्या को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की चुनौती मानकर समन्वित नीति बनाई जानी चाहिए।

अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 48 और अनुच्छेद 51(क)(ग), पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, पशु अतिक्रमण अधिनियम, 1871 तथा विभिन्न राज्यों के पशु संरक्षण संबंधी कानूनों का भी उल्लेख किया।

अदालत ने कहा कि कई राज्यों ने कानून तो बनाए हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।

पीठ ने कहा कि जब मवेशी आर्थिक रूप से उपयोगी नहीं रह जाते, तो उन्हें छोड़ देना आवारा पशुओं की समस्या का प्रमुख कारण है।

अदालत ने कहा कि जो लोग पशुपालन का निर्णय लेते हैं, उनकी जिम्मेदारी है कि वे पशुओं की जीवनभर देखभाल करें। यदि किसी कारण ऐसा संभव न हो, तो उन्हें अधिकृत गौशालाओं या आश्रय स्थलों में सुरक्षित रूप से सौंपें, न कि सड़कों पर छोड़ दें।

अदालत ने यह भी कहा कि समाज एक ओर पशुओं को भोजन के लिए इस्तेमाल किए जाने का विरोध करता है, वहीं दूसरी ओर उपयोगिता समाप्त होने पर उन्हें बेसहारा छोड़ देता है। यही विरोधाभास मौजूदा समस्या की बड़ी वजह है।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख सुझाव

जिन राज्यों में मवेशियों से संबंधित कानून लागू हैं, उनका पूरी सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।

आवारा पशुओं के कारण पैदल यात्रियों या वाहन चालकों के साथ होने वाले हादसों में मुआवजा देने की स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए।

सभी मवेशियों की टैगिंग अनिवार्य की जाए, ताकि उनकी पहचान, स्वास्थ्य जांच और टीकाकरण का रिकॉर्ड रखा जा सके।

पशु मालिक यदि किसी मवेशी को छोड़ना चाहते हैं, तो उसे अधिकृत आश्रय स्थल में ही सौंपें और उसका रिकॉर्ड डिजिटल प्रणाली में दर्ज किया जाए।

प्रत्येक नगर निगम या संबंधित विभाग में इस पूरी व्यवस्था की निगरानी के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति सभी राज्यों के मुख्य सचिवों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को भेजने का निर्देश दिया, ताकि आवश्यक कार्रवाई की जा सके।

यह मामला निशा द्वारा दायर अपील से जुड़ा था, जिनके पति विजय कुमार की वर्ष 2007 में पंजाब के संगरूर में एक आवारा सांड के हमले में मृत्यु हो गई। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पहले मुआवजा देने का आदेश रद्द करते हुए परिवार को दीवानी अदालत जाने को कहा था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए कहा कि लगभग दो दशक बाद परिवार को दीवानी मुकदमे के लिए भेजना उन्हें प्रभावी राहत से वंचित करना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि घटना कभी विवादित नहीं रही।

इन विशेष परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मृतक की पत्नी को 15 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया और कहा कि यह राशि चार सप्ताह के भीतर अदा की जाए।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश मामले के विशेष तथ्यों को देखते हुए दिया गया है और इसे भविष्य के मामलों में नजीर नहीं माना जाएगा।

Tags:    

Similar News