सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के पास ऐसे कथित अतिक्रमण को हटाने का आदेश देने का अधिकार क्षेत्र नहीं है, जो नगर निगम कानूनों का उल्लंघन करके किया गया हो।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने नई दिल्ली NGT का फैसला रद्द किया, जिसमें एक मंदिर को हटाने का आदेश दिया गया। यह मंदिर गाजियाबाद जिले के वसुंधरा, सेक्टर-16A में 'खुली जगह/पार्क' के तौर पर दिखाई गई ज़मीन पर अवैध रूप से बनाया गया था।

बेंच ने NGT Act, 2010 की धारा 14 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने के तरीके पर NGT की आलोचना की। यह धारा ट्रिब्यूनल को अनुसूची I में बताए गए कानूनों (जैसे वायु अधिनियम, जल अधिनियम, वन अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, आदि) के संबंध में पर्यावरण से जुड़े कानूनी सवालों पर फैसला सुनाने का अधिकार देती है।

बेंच ने यह माना कि खुली ज़मीन पर किसी भी अनाधिकृत निर्माण को हटाने का मुद्दा लागू नगर निगम कानूनों के दायरे में आता है। इससे पर्यावरण से जुड़ा कोई सवाल नहीं उठता। इसलिए कोर्ट ने फैसला सुनाया कि NGT ने कथित अनाधिकृत ढांचे/मंदिर को हटाने का निर्देश देकर गलती की, क्योंकि यह अतिक्रमण नगर निगम कानूनों का उल्लंघन था, न कि NGT एक्ट की अनुसूची I में बताए गए कानूनों का।

कोर्ट ने फैसला सुनाया,

"इस प्रकार, धारा 14 के तहत नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के पास केवल ऐसे मामलों में अधिकार क्षेत्र होता है, जिनमें अनुसूची I में बताए गए कानूनों के संबंध में पर्यावरण से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण कानूनी सवाल शामिल हो। इस मामले में प्रतिवादी नंबर 1 ने एक कथित अतिक्रमण को हटाने के लिए ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र का सहारा लिया था। उसके अनुसार, यह अतिक्रमण नगर निगम कानूनों और नगर नियोजन अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करके किया गया। इसलिए अधिनियम की धारा 14 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने के लिए ट्रिब्यूनल को सशक्त बनाने वाली पूर्व-शर्तें पूरी नहीं हुईं। अतः, ट्रिब्यूनल के पास कथित अतिक्रमण और कथित अवैध निर्माण को हटाने का निर्देश देने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था, क्योंकि प्रतिवादी नंबर 1 के अनुसार, यह निर्माण उन कानूनों का उल्लंघन करके किया गया, जो अधिनियम की अनुसूची I में शामिल नहीं हैं। इसलिए ट्रिब्यूनल द्वारा पारित किया गया विवादित आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर है। तदनुसार, इसे रद्द और निरस्त किया जाता है।"

तदनुसार, अपील का निपटारा किया गया और प्रतिवादी-निवासियों के कल्याण संघ [RWA] को यह स्वतंत्रता दी गई कि वह अपनी शिकायत के निवारण के लिए सक्षम प्राधिकारी से संपर्क कर सकता है।

इसके अलावा, न्यायालय ने राज्य को निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ताओं और प्रभावित पक्षों को नोटिस जारी किए बिना उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई न करे।

Cause Title: NARENDER BHARDWAJ VERSUS M/S 108 SUPER COMPLEX R.W.A. & ORS.

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