यूनिवर्सिटी शिक्षकों के वेतनमान से खिलवाड़ नहीं कर सकते, UGC नियमों से हटना संभव नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालय अपने शिक्षकों के वेतनमान को लेकर वैधानिक नियमों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों से अलग नहीं जा सकते। अदालत ने कहा कि यूनिवर्सिटी को अपने शिक्षकों के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि वे बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को ज्ञान प्रदान करने की जिम्मेदारी निभाते हैं।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने उत्तराखंड संस्कृत यूनिवर्सिटी, हरिद्वार में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त शिक्षक को बड़ी राहत देते हुए हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया। सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय को नियुक्ति की तारीख से संशोधित वेतनमान का लाभ देने और बकाया वेतन छह सप्ताह के भीतर जारी करने का निर्देश दिया।
मामले में यूनिवर्सिटी ने विज्ञापन में एसोसिएट प्रोफेसर के पद के लिए 37,400-67,000 रुपये के वेतनमान और 9,000 रुपये वार्षिक ग्रेड पे (AGP) का उल्लेख किया। हालांकि, नियुक्ति पत्र जारी करते समय शिक्षक को 15,600-39,100 रुपये का वेतनमान और 8,000 रुपये ग्रेड पे दिया गया। विश्वविद्यालय ने इसे विज्ञापन में हुई टाइपिंग की गलती बताया।
शिक्षक की नियुक्ति 15 सितंबर 2016 को हुई। बाद में राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि एसोसिएट प्रोफेसर पद पर चयनित अभ्यर्थियों को मानव संसाधन विकास मंत्रालय और UGC के मानकों के अनुसार 37,400-67,000 रुपये का वेतनमान और 9,000 रुपये एजीपी मिलना चाहिए। हालांकि, विश्वविद्यालय ने संशोधित वेतनमान का लाभ 2016 से देने के बजाय 27 दिसंबर 2018 से दिया।
शिक्षक ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि विज्ञापन में हुई टाइपिंग की गलती का लाभ कर्मचारी को नहीं दिया जा सकता। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं कि एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर 37,400-67,000 रुपये का वेतनमान और 9,000 रुपये एजीपी लागू था। विज्ञापन में भी संशोधित वेतनमान साफ तौर पर दर्ज था। ऐसे में विश्वविद्यालय केवल टाइपिंग की गलती का हवाला देकर शिक्षक को संशोधित वेतनमान से वंचित नहीं कर सकता।
अदालत ने कहा,
“विश्वविद्यालयों को अपने शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए और उनके अधिकारों को कायम रखना चाहिए।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के दिशा-निर्देशों और UGC के नियमों से हटकर वेतनमान तय नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि विज्ञापन और लागू नियमों के बीच कोई अस्पष्टता हो भी, तो नियमों और विनियमों को प्राथमिकता मिलेगी। इसलिए भले ही विज्ञापन में वेतनमान को वास्तविक टाइपिंग की गलती मान लिया जाए, UGC के नियम शिक्षक को संशोधित वेतनमान का अधिकार देते हैं।
पीठ ने कहा कि शिक्षक नियुक्ति की तारीख से ही 37,400-67,000 रुपये के संशोधित वेतनमान और 9,000 रुपये एजीपी के हकदार थे। विश्वविद्यालय को 15 सितंबर 2016 से 27 दिसंबर 2018 तक के वेतन अंतर के बकाये की गणना कर छह सप्ताह के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया गया।
इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया।