सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि NDPS एक्ट, 1985 के तहत किसी मामले में ज़ब्त गाड़ी को ज़ब्त करने का अधिकार सिर्फ़ उस कोर्ट के पास है, जो एक्ट की धारा 63 के तहत अपराध की सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि NDPS Act की धारा 52A के तहत बनी ड्रग डिस्पोज़ल कमिटी (DDC) कोर्ट के आदेश के बिना ज़ब्त गाड़ी को डिस्पोज़ करने की प्रक्रिया खुद शुरू नहीं कर सकती।

कोर्ट ने कहा,

"कानूनी तौर पर ज़ब्ती का अधिकार उस कोर्ट के पास है जो अपराध की सुनवाई कर रही है।"

इसे लागू करते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने लॉरी को उसके मालिक को सौंपने का निर्देश दिया।

बता दें, NDPS मामले में आरोपियों के बरी होने के बाद भी यह गाड़ी कस्टडी में ही थी।

याचिकाकर्ता की लॉरी को, जिसमें से कथित तौर पर 66 किलो गांजा बरामद हुआ था, रोके जाने के बाद ज़ब्त कर लिया गया। इसके बाद NDPS Act के तहत चार लोगों पर मुकदमा चलाया गया। बाद में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट (EC और NDPS मामले, पुडुकोट्टई) ने उन चारों को बरी कर दिया।

कोर्ट ने अरेस्ट मेमो में गड़बड़ी, ज़ब्त सामान को सुरक्षित रखने का कोई रिकॉर्ड न होने, महामारी के दौरान लॉरी को चलने की इजाज़त कैसे मिली, इस बारे में अभियोजन पक्ष के कुछ न बता पाने और कोर्ट व लैब में सैंपल भेजने में देरी का हवाला दिया। आरोपियों को बरी करते हुए कोर्ट ने अपील की अवधि खत्म होने के बाद लॉरी को उसके मालिक को सौंपने का निर्देश भी दिया।

हालांकि, जब अपील की अवधि खत्म होने के बाद याचिकाकर्ता ट्रायल कोर्ट पहुंचा तो उसकी अर्ज़ी खारिज कर दी गई। मद्रास हाईकोर्ट ने धारा 52A, स्टैंडिंग ऑर्डर्स और NDPS (ज़ब्ती, स्टोरेज, सैंपलिंग और डिस्पोज़ल) नियम, 2022 के तहत इस खारिज करने के फैसले को सही ठहराया, खासकर इसलिए क्योंकि जांच अधिकारी ने अलग से ट्रायल कोर्ट में गाड़ी को DDC को भेजने की अर्ज़ी दी थी।

मद्रास हाईकोर्ट का फ़ैसला 'नहुरकानी बनाम राज्य' (Nahoorkani v. State) मामले में उसके पहले के फ़ैसले पर आधारित था। उस फ़ैसले में कहा गया कि NDPS Act की धारा 63 के तहत कार्यवाही ट्रायल के दौरान ही होनी चाहिए, न कि उसके बाद। साथ ही, गाड़ियों को ज़ब्त करने का राज्य का अधिकार ट्रायल के नतीजे से स्वतंत्र होता है। एक बार यह चरण बीत जाने के बाद NDPS Act के तहत ज़ब्त की गई गाड़ियों पर अदालतों का अधिकार क्षेत्र नहीं रहता।

हाईकोर्ट के आदेश से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था।

Case: R Manimaran v State of Tamil Nadu

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