सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (25 सितंबर) को व्यक्ति को रेप के आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी आरोप पर फैसला करते समय कोर्ट पीड़िता की गवाही आंशिक रूप से खारिज नहीं कर सकता और फिर उसी गवाही को आंशिक रूप से स्वीकार करके आरोपी को रेप का दोषी नहीं ठहरा सकता।

जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया। हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट द्वारा अपीलकर्ता को रेप के लिए दोषी ठहराए जाने का फैसला बरकरार रखा। यह दोषसिद्धि पीड़िता की गवाही के उस हिस्से पर आधारित थी, जिसमें उसने शारीरिक संबंध बनाने के लिए सहमति देने से इनकार किया, जबकि सेशंस कोर्ट ने अपीलकर्ता को अपहरण के अपराध से बरी करते समय उसी गवाही को खारिज किया।

कोर्ट ने कहा,

"IPC की धारा 366 के मकसद से पीड़िता के सबूतों को आंशिक रूप से खारिज करना और IPC की धारा 376 के तहत आरोप साबित करने के मकसद से उसी बयान को आंशिक रूप से स्वीकार करना संभव नहीं है। अगर पीड़िता के सबूत विश्वसनीय हैं तो उन्हें पूरी तरह से स्वीकार किया जाना चाहिए। पीड़िता के बयान को आंशिक रूप से स्वीकार और आंशिक रूप से खारिज नहीं किया जा सकता।"

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पीड़िता का सहमति न देने का बयान ही दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए काफी नहीं है; बल्कि, उसकी गवाही को पूरे संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

कोर्ट ने आगे कहा,

"अगर उसके सबूतों को समग्र रूप से देखा जाए तो निश्चित रूप से यह राय बनाई जा सकती है कि उसका यह बयान कि आरोपी अपीलकर्ता ने उसकी सहमति के बिना जबरन उसके साथ यौन संबंध बनाए, स्वीकार करने लायक नहीं है। पीड़िता का बयान बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं है।"

यह मामला इस आरोप से जुड़ा था कि अपीलकर्ता पीड़िता को - जो आठवीं कक्षा में पढ़ रही थी - पहले लुधियाना के एक फ्लैट में और उसके बाद मलेरकोटला की एक बंद पड़ी फैक्ट्री में ले गया, जहां उसने कथित तौर पर उसकी मर्जी के खिलाफ उसके साथ यौन संबंध बनाए। सेशन कोर्ट ने अपील करने वाले व्यक्ति को IPC की धारा 366 के तहत लगे आरोपों से बरी किया। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि पीड़िता नाबालिग थी या उसका अपहरण किया गया। हालांकि, कोर्ट ने उसे IPC की धारा 376 के तहत दोषी ठहराया और 10 साल की कठोर कैद की सज़ा सुनाई।

हाईकोर्ट ने इस सज़ा को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने एविडेंस एक्ट की धारा 114A के तहत अनुमान (Presumption) का आधार लिया, क्योंकि पीड़िता ने सहमति न होने की बात कही थी। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

अपील को मंज़ूरी देते हुए जस्टिस भुयन के लिखे फ़ैसले में सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा IPC की धाराओं 366 और 376 के तहत निष्कर्षों में तालमेल बिठाने के लिए अपनाए गए तर्क की आलोचना की गई।

कोर्ट ने कहा,

"हमें लगता है कि सेशन जज ने आरोपी-अपीलकर्ता को IPC की धारा 376 के तहत दोषी ठहराने को सही ठहराने में पूरी तरह से गलती की। हाईकोर्ट ने भी ऐसे उलझे हुए तर्क को मानकर गलती की।"

रेप के मामले में अपीलकर्ता को दोषी ठहराने के लिए एविडेंस एक्ट की धारा 114A पर हाई कोर्ट के भरोसे से असहमति जताते हुए कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के सहमति न होने का दावा उसके बाकी बयानों से अलग करके नहीं देखा जा सकता, खासकर तब जब उसके बयानों में अहम विरोधाभास हों। कानूनी अनुमान पर सबूतों के पूरे संदर्भ में विचार किया जाना चाहिए।

कोर्ट के अनुसार, ऐसा कोई कानूनी नियम नहीं है, जिसके तहत हर रेप केस में पीड़िता के बयान की पुष्टि (Corroboration) ज़रूरी हो। हालांकि, जब सिर्फ़ उसके बयान के आधार पर सज़ा दी जानी हो, तो सबूत ऐसे होने चाहिए जिनसे कोर्ट को भरोसा हो सके।

कोर्ट को पीड़िता के सबूतों में कई अहम विरोधाभास मिले।

Cause Title: PARAMJIT SINGH BEDI VERSUS STATE OF PUNJAB

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