MMDR Act | लीज़ डीड में रॉयल्टी में बदलाव के बारे में कुछ न कहे जाने के बावजूद सरकार रॉयल्टी की दर बदल सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (13 जुलाई) को कहा कि माइनिंग लीज़ डीड में खनिजों की माइनिंग पर रॉयल्टी में बदलाव के बारे में कुछ न कहे जाने का मतलब यह नहीं है कि सरकार 'माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1957' के तहत समय-समय पर रॉयल्टी की दर बदलने की अपनी शक्ति खो देगी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा,
"माइनिंग लीज़ एक कानूनी ग्रांट है, जबकि रॉयल्टी कानूनी लेवी (शुल्क) है। समय-समय पर रॉयल्टी में बदलाव करने की शक्ति MMDR Act की धारा 15 और उसके तहत बने नियमों [खासकर 1964 के नियमों के नियम 21(1)(i)(a) के प्रावधान] से मिलती है। लीज़ डीड में रॉयल्टी में बदलाव के बारे में कुछ न कहे जाने से राज्य की कानूनी शक्ति खत्म नहीं हो सकती और न ही यह MMDR Act की धारा 15 और उसके तहत बने नियमों के तहत शक्ति के इस्तेमाल में कोई रुकावट बन सकती है। इसलिए लीज़ लेने वाला पूरी लीज़ अवधि के लिए एक ही रॉयल्टी दर पर अपना अधिकार नहीं जता सकता।"
हरियाणा सरकार ने 2001 में छोटे खनिजों के लिए माइनिंग लीज़ की नीलामी की थी और सफल बोलीदाताओं (जिनमें प्रतिवादी भी शामिल था) को सात साल की माइनिंग लीज़ दी गई। 2005 में राज्य ने लीज़ के तहत देय रॉयल्टी और डेड रेंट की दरों को बढ़ाने के लिए एक नोटिफिकेशन जारी किया।
लीज़ लेने वालों ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में इस नोटिफिकेशन को चुनौती दी। उनका तर्क था कि उनकी लीज़ डीड में लीज़ की अवधि के दौरान रॉयल्टी या डेड रेंट में बदलाव की अनुमति नहीं थी, बढ़ोतरी मनमानी थी और यह राज्य के 'रूल्स ऑफ़ बिज़नेस' का उल्लंघन था। हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार किया और नोटिफिकेशन रद्द किया।
हरियाणा राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। उनका तर्क था कि लीज़ डीड में ऐसे बदलाव की अनुमति देने वाली कोई स्पष्ट शर्त न होने के बावजूद, वे माइनिंग लीज़ की अवधि के दौरान रॉयल्टी और डेड रेंट में बदलाव कर सकते हैं।
राज्य के तर्क में दम पाते हुए जस्टिस दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में विवादित निर्णय रद्द कर दिया गया। फैसले में कहा गया कि माइनिंग लीज़ MMDR Act और उसके तहत बने नियमों के तहत की गई कानूनी ग्रांट हैं, जिससे कानूनी प्रावधान हर लीज़ का अंतर्निहित हिस्सा बन जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि भले ही राज्य सरकारें कॉन्ट्रैक्ट कर सकती हैं, लेकिन वे जनहित में मिली अपनी कानूनी शक्तियों को बातचीत के ज़रिए छोड़ नहीं सकतीं।
कोर्ट ने कहा,
"यह तय कानून है कि कोई कॉन्ट्रैक्ट सरकार को कानूनी शक्ति का इस्तेमाल करने से नहीं रोक सकता।"
रॉयल्टी दरों में बढ़ोतरी का आधार बनाने के लिए गणितीय सटीकता की ज़रूरत नहीं
कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया कि ठोस सबूतों की कमी के कारण बढ़ोतरी मनमानी थी।
बेंच ने गौर किया कि राज्य ने पड़ोसी राज्यों में लागू रॉयल्टी दरों पर विचार किया और पिछली बार दरों में बदलाव सितंबर 1999 में हुआ, जबकि विवादित नोटिफिकेशन जून 2005 में जारी किया गया, जो MMDR Act की धारा 15 के तहत तीन साल की कानूनी समय-सीमा से काफी ज़्यादा है।
बढ़ोतरी की मात्रा की जांच करने से इनकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि वित्तीय नीति की न्यायिक समीक्षा सीमित होती है।
कोर्ट ने यह बात कही,
“कानून यह नहीं कहता कि राज्य को गणितीय सटीकता के साथ यह साबित करना होगा कि बढ़ोतरी को 50% तय करने का आधार क्या है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि किसी पॉलिसी के फैसले पर अपील की तरह विचार करना और यह पता लगाना कोर्ट का काम नहीं है कि 40% या 60% की बढ़ोतरी बेहतर होती या नहीं। फिस्कल और इकोनॉमिक पॉलिसी के मामलों में अगर सरकार को काम करने में थोड़ी छूट न दी जाए तो सरकारी मशीनरी ठीक से काम नहीं कर पाएगी। इसलिए कोर्ट को यह जांचने की ज़रूरत नहीं है कि क्या कम बढ़ोतरी से भी काम चल जाता। रेट की समझदारी या औचित्य की जांच करना न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आता। इसकी जांच 'वेडन्सबरी अनरीज़नेबिलिटी' (Wednesbury unreasonableness) के आधार पर होती है। सीमित जांच का मकसद यह देखना है कि क्या फैसला इतना बेतुका, अनुपातहीन या अप्रासंगिक है कि कोई भी समझदार अथॉरिटी ऐसा फैसला नहीं ले सकती थी।”
कोर्ट ने आगे कहा,
“इस मामले में बढ़ोतरी को बेतुका या अनुपातहीन नहीं कहा जा सकता। पिछली बार बदलाव सितंबर 1999 में हुआ। जिस बदलाव पर सवाल उठाया गया, वह जून 2005 में किया गया, यानी लगभग साढ़े पांच साल बाद। 'डेड रेंट' (dead rent) के विपरीत, जिसे हर तीन साल में ज़्यादा-से-ज़्यादा 50% तक बढ़ाया जा सकता है, रॉयल्टी के लिए कोई अधिकतम सीमा तय नहीं है। नियम 21(1)(i)(a) का प्रावधान सिर्फ़ यह कहता है कि रॉयल्टी का भुगतान “समय-समय पर तय किए गए संशोधित रेट” पर किया जाना चाहिए। इसलिए पांच साल से ज़्यादा समय के बाद बढ़ोतरी, और वह भी 50% (जो डेड रेंट के लिए सोची गई अधिकतम सीमा के भीतर है, अगर इसे तुलना के लिए पैमाना माना जाए) को ज़रूरत से ज़्यादा या मनमाना नहीं कहा जा सकता।”
नतीजतन, कोर्ट ने बढ़ोतरी के नोटिफिकेशन को बहाल किया और कहा कि हाईकोर्ट ने माइनिंग लीज़ को कानूनी ढांचे से अलग पूरी तरह से कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर किया गया समझौता मानकर गलती की।
अपील मंज़ूर कर ली गई।
Cause Title: THE STATE OF HARYANA & ORS. VERSUS M/S FARIDABAD GURGAON MINERALS & ANR. (with connected case)