किसी डॉक्यूमेंट को सबूत के तौर पर पेश के तौर पर मार्क करना ही उसकी सामग्री का सबूत नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (7 अगस्त) को कहा कि किसी ऐसे डॉक्यूमेंट को स्वीकार करने पर उठाई गई आपत्तियों पर, जो केस के फ़ैसले के लिए शुरुआती तौर पर ज़रूरी है, आम तौर पर शुरुआती स्टेज पर ही फ़ैसला नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ इसलिए कि डॉक्यूमेंट को 'एग्ज़िबिट' के तौर पर पेश किया गया।
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल के शुरुआती स्टेज में किसी डॉक्यूमेंट को 'एग्ज़िबिट' (सबूत के तौर पर पेश) के तौर पर पेश करने का मतलब यह नहीं है कि उसकी सामग्री साबित हो गई; इसलिए 'एग्ज़िबिट' किए गए डॉक्यूमेंट्स को कानून के अनुसार साबित करना ज़रूरी है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने उस मामले की सुनवाई की, जो मद्रास हाईकोर्ट के एक फ़ैसले से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने अपील करने वाले प्रतिवादी (Defendant) की याचिका खारिज की, जिसमें उसने प्रोबेट की कार्यवाही में वादी (Plaintiff) द्वारा अपने सबूत हलफ़नामे में पेश किए गए कुछ डॉक्यूमेंट्स को हटाने के लिए CPC के ऑर्डर XIII नियम 3 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करने से हाई कोर्ट के इनकार को चुनौती दी थी।
CPC का ऑर्डर XIII नियम 3 कोर्ट को यह अधिकार देता है कि वह केस के किसी भी स्टेज पर किसी भी ऐसे डॉक्यूमेंट को खारिज कर दे, जिसे वह अप्रासंगिक या अन्यथा अस्वीकार्य मानती है। ऐसा करने के कारण भी दर्ज करे। जहां फ़ोटोकॉपी किए गए डॉक्यूमेंट्स को हटा दिया गया, वहीं हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवादों, लंबित मुकदमों और संपत्ति के लेन-देन से संबंधित अन्य डॉक्यूमेंट्स को 'एग्ज़िबिट' के तौर पर पेश करने की अनुमति दी।
हाईकोर्ट का फ़ैसला सही ठहराते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि उन डॉक्यूमेंट्स को शुरुआती स्टेज पर खारिज नहीं किया जा सकता, जो मामले की जड़ तक जा सकते हैं और केस के फ़ैसले के लिए ज़रूरी हो सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि वैसे भी डॉक्यूमेंट्स को कानून के अनुसार साबित करना ही होगा और उन्हें 'एग्ज़िबिट' के तौर पर मार्क करने की अनुमति देने से उनकी प्रमाणिकता या सच्चाई अपने आप साबित नहीं हो जाती।
कोर्ट ने कहा,
"यह भी स्थापित कानून है कि किसी डॉक्यूमेंट को 'एग्ज़िबिट' के तौर पर मार्क करना ही उसकी सामग्री का सबूत नहीं है... इसलिए इस मामले में, जिन डॉक्यूमेंट्स को मार्क/एग्ज़िबिट किया गया, उनकी सामग्री को कानून के अनुसार साबित करना होगा। हमें इस स्टेज पर उन्हें हटाने का कोई कारण नहीं दिखता।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"हमें निचली अदालतों के तर्क में दखल देने का कोई कारण नहीं दिखता। सिंगल जज ने सही तौर पर उन दस्तावेज़ों को खारिज कर दिया, जिनकी ओरिजिनल कॉपी के बजाय ज़ेरॉक्स कॉपी जमा की गईं और जिनका कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया। इसके अलावा, जिन अन्य दस्तावेज़ों को मार्क और पेश किया गया, उन पर जो आपत्तियां उठाई गईं, वे ऐसी नहीं हैं जिनसे वे दस्तावेज़ कानून की नज़र में शुरुआती तौर पर अमान्य या इस मुकदमे से जुड़ी प्रॉपर्टी के लिए अप्रासंगिक हो जाएं। इसलिए इस मामले में सिविल प्रोसीजर कोड, 1908 के ऑर्डर XIII नियम 3 के तहत इस कोर्ट द्वारा अपनी शक्ति का इस्तेमाल करने की ज़रूरत नहीं है।”
आख़िरकार, अपील खारिज कर दी गई।
Cause Title: S. SANGEETHA & ORS. VERSUS TMT. P. PONNI
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