असहमति दबाने के लिए दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द करें अदालतें, नागरिकों को क्या बोलना चाहिए यह बताना न्यायपालिका का काम नहीं: जस्टिस अभय ओक

Update: 2026-08-03 10:21 GMT

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय एस. ओक ने कहा है कि संवैधानिक अदालतों का कर्तव्य है कि वे असहमति की आवाज दबाने के उद्देश्य से दर्ज किए गए आपराधिक मामलों को रद्द करें और नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करें। उन्होंने कहा कि अदालतों का काम यह तय करना नहीं है कि कोई नागरिक क्या बोले या क्या न बोले।

एडवोकेट हारून सोलकर मेमोरियल लेक्चर सीरीज़ में "अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 21: पालन या उपेक्षा" विषय पर बोलते हुए जस्टिस ओका ने कहा कि संवैधानिक दायरे में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिकों का मौलिक अधिकार है। यदि लोगों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी असहमति व्यक्त करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, तो लोकतंत्र कमजोर होगा।

उन्होंने कहा कि जब किसी नागरिक के खिलाफ केवल उसकी अभिव्यक्ति को दबाने के उद्देश्य से आपराधिक मामला दर्ज किया जाता है और वह अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो अदालत का दायित्व है कि वह यह देखे कि क्या वास्तव में कोई अपराध बनता है और क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन हुआ है। यदि मौलिक अधिकार का हनन हुआ है, तो अदालत को राहत देनी चाहिए, भले ही वह संबंधित व्यक्ति के विचारों से सहमत न हो

जस्टिस ओक ने कहा कि अदालतों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित या सीमित करने वाला संस्थान नहीं, बल्कि उसका संरक्षक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि अदालतें ही मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं करेंगी, तो फिर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा।

उन्होंने हाल ही में न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां के उस भाषण का भी उल्लेख किया, जिसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति न देने वाले एक हाईकोर्ट के आदेश की आलोचना की गई थी। जस्टिस ओका ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति संविधान के दायरे में रहकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहता है, तो पुलिस को इसकी अनुमति देनी चाहिए और अदालतों का भी यही दायित्व है कि वे ऐसे अधिकारों की रक्षा करें।

जस्टिस ओका ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 51A में वर्णित मूल कर्तव्य केवल नागरिकों पर ही नहीं, बल्कि राज्य और उसकी संस्थाओं पर भी समान रूप से लागू होते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य का दायित्व है कि वह संविधान के आदर्शों, विशेषकर लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करे।

उन्होंने चिंता जताई कि हाल के वर्षों में आईपीसी की धारा 153A और 153B का इस्तेमाल कई मामलों में केवल इसलिए किया गया क्योंकि कुछ लोगों के विचार दूसरों को पसंद नहीं आए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक नेतृत्व और कानून लागू करने वाली एजेंसियों में आलोचना सहने की क्षमता कम होती जा रही है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा बढ़ रहा है।

जस्टिस ओक ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार का कर्तव्य है कि वह नागरिकों की मांगों और विचारों पर संवाद करे। सरकार किसी मांग को स्वीकार करे या न करे, लेकिन उसे उस पर विचार अवश्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि असहमति का जवाब मुकदमे दर्ज कराकर नहीं, बल्कि संवाद और तर्क के माध्यम से दिया जाना चाहिए।

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