सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (08.09.2026) को कहा कि जब नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 (NH Act) के तहत सक्षम अधिकारी 01.01.2015 से पहले मुआवज़ा तय करते हैं तो ज़मीन मालिक को दिए जाने वाले सोलेशियम, ब्याज और सोलेशियम पर ब्याज की गणना 'ज़मीन अधिग्रहण एक्ट, 1894' के तहत की जानी चाहिए, न कि 'ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार एक्ट, 2013' के तहत। बता दें, 01.01.2015 वह तारीख है, जब NH Act के तहत किए गए अधिग्रहण के लिए 2013 का एक्ट लागू किया गया।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विनोद के चंद्रन की बेंच ने NH Act के तहत ज़मीन अधिग्रहण के मामले से जुड़ी एक अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। इस मामले में विवाद यह था कि "नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 के तहत किए गए अधिग्रहण के लिए सोलेशियम, ब्याज और सोलेशियम पर ब्याज के दावे की गणना 'ज़मीन अधिग्रहण एक्ट, 1894' के तहत की जानी चाहिए या 'ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार एक्ट, 2013' के तहत।"

अपीलकर्ता की ज़मीन NH Act के तहत 2011 में नोटिफ़िकेशन (जो धारा 3A के तहत पब्लिश हुआ) के ज़रिए एक्वायर की गई। बाद में 2012 में सेक्शन 3D के तहत घोषणा पब्लिश की गई। NH Act के तहत सक्षम अधिकारी ने 2014 में मुआवज़े की रकम ₹3,47,38,287 तय की, जिसमें से अपीलकर्ता को 2014 में ₹49,17,000 मिले। इसके बाद अपीलकर्ता ने आर्बिट्रेशन के लिए रेफरेंस मांगा, जिसमें आर्बिट्रेटर ने 2016 में अवॉर्ड पास किया। बाद में आर्बिट्रेशन एंड कंसिलिएशन एक्ट, 1996 के सेक्शन 34 और 37 के तहत सुप्रीम कोर्ट में इस अवॉर्ड को चुनौती दी गई।

सुप्रीम कोर्ट के सामने अपीलकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट हरिन पी रावल ने 'यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम तरसेम सिंह (तरसेम सिंह II)' का हवाला देते हुए कहा कि कोर्ट ने 'तरसेम सिंह  (2019)' को भविष्य में लागू करने (Prospective Operation) से इनकार किया, क्योंकि उस ज़मीन के मालिक, जिसकी ज़मीन 31.12.2014 को एक्वायर की गई। साथ ही उस मालिक, जिसकी ज़मीन उसके अगले दिन एक्वायर की गई, के बीच सोलेशियम (Solatium) और ब्याज के फ़ायदे में कोई फ़र्क नहीं हो सकता। इस आधार पर अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि वह 2013 एक्ट के तहत पूरे फ़ायदे पाने का हकदार है। इसके अलावा, चूंकि आर्बिट्रेटर का अवॉर्ड 2017 में पास हुआ, इसलिए यह भी तर्क दिया गया कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (NHAI) के अपने तर्क के अनुसार भी 2013 एक्ट लागू होगा।

NHAI, जिसका प्रतिनिधित्व सीनियर एडवोकेट अंकुर मित्तल कर रहे थे, ने ज़मीन मालिक के सोलेशियम, ब्याज और सोलेशियम पर ब्याज पाने के अधिकार पर कोई विवाद नहीं किया। हालांकि, उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि 2013 एक्ट NH Act के तहत की गई ज़मीन की एक्विज़िशन पर केवल 01.01.2015 से लागू किया गया। अवॉर्ड 2014 में पास हुआ, इसलिए फ़ायदों की गणना 1984 एक्ट के तहत की जानी चाहिए। इसके लिए 'नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया बनाम तरसेम सिंह (तरसेम सिंह III)' का हवाला दिया गया।

कानूनी बैकग्राउंड को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि NH Act में 1997 के संशोधन से धारा 3J जोड़ा गया, जिससे NH Act के तहत ज़मीन अधिग्रहण पर 1894 के एक्ट का लागू होना बंद हो गया। 'तरसेम सिंह I' मामले में इस प्रावधान को आर्टिकल 14 का उल्लंघन करने के कारण असंवैधानिक करार दिया गया।

बेंच ने उस फैसले का ज़िक्र करते हुए कहा,

"1997 के संशोधन एक्ट से पहले और 2013 के एक्ट के लागू होने के बाद भी, उन ज़मीन मालिकों को सोलेशियम (मुआवज़े के अलावा अतिरिक्त राशि) और ब्याज दिया जाता है, जिनकी ज़मीन नेशनल हाईवे के मक़सद से अनिवार्य रूप से अधिग्रहित की जाती है। 1997 से 2015 के बीच की अवधि के लिए 1997 के संशोधन एक्ट की संवैधानिक वैधता पर विचार करते समय यह एक और बहुत महत्वपूर्ण बात है जिसे ध्यान में रखा जाना चाहिए।"

2013 के एक्ट के सेक्शन 105 की जांच करते हुए बेंच ने बताया कि हालांकि यह एक्ट 01.01.2014 को लागू हुआ, लेकिन इसके मुआवज़े से जुड़े प्रावधान चौथी अनुसूची (जिसमें NH Act भी शामिल है) में सूचीबद्ध कानूनों पर 01.01.2015 से ही लागू किए गए।

बेंच ने 'तरसेम सिंह II' के दायरे को भी स्पष्ट किया और कहा कि इसमें यह नहीं कहा गया कि 01.01.2015 से पहले के सोलेशियम और ब्याज की गणना भी 2013 के एक्ट के तहत की जानी चाहिए।

अदालत ने कहा,

“तरसेम सिंह-II मामले में यह बात नहीं कही गई है कि 01.01.2015 से पहले के मामलों में भी सोलेशियम (मुआवजे के साथ मिलने वाली अतिरिक्त राशि) और ब्याज की गणना 2013 के एक्ट के प्रावधानों के आधार पर की जानी चाहिए—यहां तक ​​कि 2013 के एक्ट के लागू होने की तारीख (01.01.2014) से भी नहीं; क्योंकि NH Act के तहत ज़मीन अधिग्रहण के मामलों में 2013 का एक्ट 01.01.2015 से ही लागू हुआ। यह बात तो पक्की है कि जिन ज़मीन मालिकों की ज़मीन 01.01.2015 को या उससे पहले अधिग्रहित की गई, वे भी सोलेशियम और ब्याज के हकदार हैं; लेकिन यह हक इस आधार पर तय होगा कि 'अवार्ड' (मुआवज़े का अंतिम आदेश) 01.01.2015 से पहले पारित किया गया या बाद में। अगर पहले पारित किया गया, तो हक 1894 के एक्ट के तहत मिलेगा और अगर बाद में, तो 2013 के एक्ट के तहत।”

कोर्ट ने आगे कहा कि NH Act की धारा 3G(1) के तहत सक्षम अधिकारी द्वारा किया गया फ़ैसला, 1894 के एक्ट की धारा 11 के तहत दिए गए अवॉर्ड (मुआवज़े के फ़ैसले) जैसा ही है। बेंच ने 'इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मनोहरलाल' मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि अगर 01.01.2014 तक 1894 के एक्ट की धारा 11 के तहत कोई अवॉर्ड नहीं दिया गया तो मुआवज़े का निर्धारण 2013 के एक्ट के तहत किया जाना चाहिए।

इसके आधार पर बेंच ने तर्क दिया,

"अगर 2013 के एक्ट के लागू होने की तारीख, यानी 01.01.2014 से पहले कोई अवॉर्ड दिया गया तो मुआवज़े का निर्धारण 1894 के एक्ट के प्रावधानों के तहत (उस एक्ट की धारा 18 के संदर्भ में और किसी भी आगे की चुनौती में) किया जाना होगा, जिसमें सोलेशियम (अतिरिक्त मुआवज़ा) और ब्याज उसी एक्ट के अनुसार मिलेगा। हालांकि, अगर अवॉर्ड 01.01.2014 के बाद दिया जाता है, तो ज़ाहिर है कि इसे 2013 के एक्ट के तहत ज़्यादा फ़ायदेमंद प्रक्रियाओं के अनुसार माना जाएगा, भले ही ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया 1894 के एक्ट के तहत शुरू हुई हो।"

ऊपर बताई गई बातों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

"अगर मुआवज़े का निर्धारण 01.01.2015 से पहले नहीं किया गया तो 2013 का एक्ट लागू होगा। लेकिन अगर NH Act के तहत सक्षम अधिकारी द्वारा 01.01.2015 से पहले मुआवज़े का निर्धारण किया जाता है - भले ही यह 01.01.2014 के बाद हो - तो सोलेशियम और ब्याज का भुगतान 1894 के एक्ट के तहत किया जाएगा।"

अपीलकर्ता ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी एक नोटिफिकेशन का भी हवाला देते हुए तर्क दिया कि जिन मामलों में 31.12.2014 तक अवॉर्ड की घोषणा नहीं की गई या ज़मीन के ज़्यादातर हिस्सों के लिए मुआवज़े का भुगतान नहीं किया गया, वहां मुआवज़े का भुगतान 2013 के एक्ट की पहली अनुसूची (First Schedule) के तहत किया जाएगा।

हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को खारिज किया और कहा,

"नोटिफिकेशन में इस्तेमाल किया गया शब्द 'ज़मीन के मालिकों' (landowners) के बजाय 'ज़मीन की होल्डिंग्स' (land holdings) का बहुमत है। NHAI ने काउंटर एफिडेविट के साथ पेश किए गए Annexure R-1 में यह दलील दी कि कुल 3.080 हेक्टेयर ज़मीन का अधिग्रहण किया गया था, जिसमें से 1.700 हेक्टेयर के लिए मुआवज़ा 2014 में ही दे दिया गया था। यह नोटिफिकेशन अपीलकर्ता के पक्ष में नहीं है।"

अपील मंज़ूरी देते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि आर्बिट्रल अवार्ड (मध्यस्थता निर्णय) के तहत तय किए गए मुआवज़े के साथ 1894 के एक्ट के प्रावधानों के अनुसार सोलेशियम (solatium), ब्याज और सोलेशियम पर ब्याज भी दिया जाए और मामले को सक्षम अधिकारी (Competent Authority) के पास वापस भेज दिया।

Case: Manav Bhanot v National Highway Authority of India

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: