सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (7 अक्टूबर) को कहा कि किसी इंडस्ट्रियल यूनिट के बिजली खर्च के आधार पर तय की गई बिजली सब्सिडी एक 'रेवेन्यू रिसिप्ट' (आय) है जिस पर टैक्स लग सकता है, अगर इसका मकसद कैपिटल इन्वेस्टमेंट में योगदान देने के बजाय ऑपरेशनल लागत को कम करना हो।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने टैक्सपेयर की अपील खारिज की। बेंच ने टैक्स अधिकारियों और मद्रास हाईकोर्ट का वह फैसले सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि पुडुचेरी सरकार की स्कीम के तहत टैक्सपेयर को मिली ₹16,20,745 की बिजली सब्सिडी पर टैक्स लगेगा।

कोर्ट ने फिर कहा कि सब्सिडी की प्रकृति तय करने के लिए "मकसद की जांच" (Purpose Test) करनी चाहिए, यानी यह देखना चाहिए कि यह किस मकसद से दी गई है और स्कीम असल में कैसे काम करती है।

साहनी स्टील एंड प्रेस वर्क्स लिमिटेड बनाम CIT और CIT बनाम पोन्नी शुगर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड के अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने साफ किया कि सब्सिडी का समय, स्रोत या रूप निर्णायक नहीं होता। असल बात यह है कि क्या यह मदद बिजनेस के ऑपरेशनल खर्चों में सहायता करती है या कैपिटल इन्वेस्टमेंट में मदद करती है।

चूंकि स्कीम में इस रकम का इस्तेमाल एसेट खरीदने या कैपिटल इन्वेस्टमेंट के लिए करने की शर्त नहीं थी, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग में होने वाले बिजली खर्च को कम करने के लिए थी (जो प्रोडक्शन शुरू होने के पांच साल तक मिलती थी), इसलिए जस्टिस मिश्रा के फैसले में कहा गया कि अपीलकर्ता को मिली रकम कैपिटल के मकसद से नहीं, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस में बिजली की लागत कम करने के लिए थी; इसलिए इसे केवल ऑपरेशनल सब्सिडी माना जाएगा क्योंकि यह टैक्सपेयर को ऑपरेशनल मदद के तौर पर दी गई।

कोर्ट ने कहा,

“इसका जवाब खुद स्कीम से ही मिलता है, क्योंकि फ़ायदे की गणना असल एनर्जी चार्ज के एक तय प्रतिशत के तौर पर की जाती है। यह स्कीम प्रोडक्शन शुरू होने के साथ ही एक सीमित समय के लिए लागू होती है। इसका तुरंत और सीधा असर मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस में होने वाले बिजली के खर्च को कम करना होता है। इस स्कीम के तहत सब्सिडी का इस्तेमाल प्लांट या मशीनरी खरीदने, फ़ैक्ट्री बनाने, कैपिटल लोन चुकाने या कोई और कैपिटल एसेट बनाने के लिए करना ज़रूरी नहीं है। हमारे सामने मौजूद रिकॉर्ड से यह पता नहीं चलता कि अपील करने वाले को मिली रकम किसी ऐसे कैपिटल मकसद के लिए तय की गई। इसके विपरीत, रकम तय करने का आधार ही प्रोडक्शन में इस्तेमाल हुई बिजली पर होने वाला खर्च है।”

कोर्ट ने माना,

“हमने पाया कि असेसिंग ऑफ़िसर, CIT (अपील्स) और ITAT ने सब्सिडी की प्रकृति को सही ढंग से समझा था—कि यह एक रेवेन्यू रिसिप्ट है और इसे इंडस्ट्रियल यूनिट के बनने और प्रोडक्शन शुरू होने के बाद दिया गया; इसकी गणना बिजली के चार्ज के आधार पर की गई; इसने अपील करने वाले (असेसी) के बिजली के खर्च को कम किया; और यह साबित नहीं हुआ कि यह किसी नए कैपिटल एसेट को बनाने में योगदान है”

नतीजतन, अपील खारिज कर दी गई।

Case Title : M/S. MEPCO INDUSTRIES LTD. VERSUS COMMISSIONER OF INCOME TAX COMPANY CIRCLE

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: