सरकार को जनहित में उद्योगों को दी गई टैक्स छूट वापस लेने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-03-31 04:03 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा दी गई टैक्स छूट से पाने वाले का कोई ऐसा पक्का अधिकार नहीं बन जाता कि वह हमेशा के लिए उस छूट का दावा करता रहे, और सरकार जनहित में ऐसी छूट वापस ले सकती है।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने महाराष्ट्र सरकार की अपील को मंज़ूर करते हुए यह बात कही। यह अपील कैप्टिव पावर जेनरेटरों के खिलाफ थी। बेंच ने सरकार के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें उसने कैप्टिव पावर (वह बिजली जो उद्योग अपनी ज़रूरत के लिए खुद बनाते हैं, बिना ग्रिड सप्लाई पर निर्भर रहे) बनाने के लिए उन्हें मिलने वाले टैक्स फायदों को वापस ले लिया था।

यह विवाद महाराष्ट्र सरकार द्वारा 1994 से 'बॉम्बे इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी एक्ट, 1958' की धारा 5A के तहत दी गई बिजली शुल्क छूट से जुड़ा है। यह छूट उद्योगों द्वारा कैप्टिव पावर बनाने को बढ़ावा देने के लिए दी गई।

साल 2000-2001 में राज्य सरकार ने आर्थिक तंगी और सरकारी राजस्व बढ़ाने की ज़रूरत का हवाला देते हुए इन छूटों को आंशिक रूप से वापस ले लिया था। हाईकोर्ट ने इस वापसी को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताते हुए रद्द किया था, जिसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस अराधे द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि ऐसी छूटें कानूनी रियायतें होती हैं, न कि कोई ठेके वाले वादे; इसलिए सरकार इन्हें बदल सकती है या वापस ले सकती है।

कोर्ट ने कहा,

"अगर कोई पक्ष किसी नोटिफिकेशन के आधार पर काम करता है और उस पर भरोसा करता है तो उसे यह पता होना चाहिए कि ऐसे नोटिफिकेशन में कभी भी बदलाव किया जा सकता है या उसे रद्द किया जा सकता है, अगर सरकार को लगे कि जनहित में ऐसा करना ज़रूरी है। हालांकि, कोर्ट को खुद इस बात से संतुष्ट होना चाहिए कि वाकई में ऐसा कोई जनहित मौजूद है।"

उद्योगों द्वारा 'प्रॉमिसरी एस्टोपल' (वादे के आधार पर अधिकार का दावा) के सिद्धांत पर किए गए भरोसे को खारिज करते हुए, कोर्ट ने कहा कि ऐसी योजनाओं के लाभार्थियों को यह पता होता है कि कानून के तहत दी गई छूटें जनहित में कभी भी वापस ली जा सकती हैं।

अदालत ने कहा,

“इसलिए कैप्टिव पावर जेनरेटर के पास छूट को अनिश्चित काल तक जारी रखने पर ज़ोर देने का कोई कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार नहीं है। उनका अधिकार केवल उस अवधि के दौरान छूट का लाभ उठाने तक सीमित था, जब तक वह लागू रही। बिजली शुल्क के भुगतान से छूट न तो समय से पहले वापस ली गई, और न ही इसे पिछली तारीख से लागू करके वापस लिया गया। कर भुगतान से छूट का लाभ उठाने का अधिकार एक ऐसा अधिकार है, जिसे वापस लिया जा सकता है, क्योंकि जिस शक्ति के तहत यह छूट दी गई, उसी शक्ति का प्रयोग करके इसे वापस भी लिया जा सकता है।”

अदालत ने आगे कहा,

“चूंकि छूट को वापस लेने और उसमें संशोधन करने का निर्णय जनहित में लिया गया, इसलिए 'वैध अपेक्षा' (Legitimate Expectation) और 'वचन विबंधन' (Promissory Estoppel) के सिद्धांत इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर लागू नहीं होते हैं।”

हालांकि सरकार के पास रियायतें वापस लेने की शक्ति है, लेकिन वापस लेने का तरीका 'निष्पक्षता के सिद्धांतों' का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।

अदालत ने कहा,

“हालांकि राज्य के पास निस्संदेह, किसी वैधानिक प्रावधान के तहत दी गई रियायत को वापस लेने या उसमें संशोधन करने की शक्ति है, लेकिन जिस तरीके से छूट वापस लेने की इस वैधानिक शक्ति का प्रयोग किया जाता है, उसे भी 'तर्कसंगतता' और 'निष्पक्षता' की आवश्यकताओं को पूरा करना चाहिए। निष्पक्षता के सिद्धांत यह मांग करते हैं कि छूट को इस तरह से वापस न लिया जाए, जिससे उन लोगों को अनावश्यक कठिनाई हो, जिन्होंने पहले दी गई रियायत के आधार पर अपने कामकाज की रूपरेखा तैयार की थी।”

अदालत ने यह भी बताया,

“जिन लोगों ने किसी रियायत के आधार पर अपनी वाणिज्यिक या औद्योगिक गतिविधियों की रूपरेखा तैयार की, उन्हें अचानक किए गए नीतिगत बदलावों का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, जिससे उन्हें बदले हुए नियामक ढांचे के अनुसार खुद को ढालने के लिए पर्याप्त समय न मिल पाए।”

इस कसौटी पर परखने के बाद अदालत ने पाया कि सरकार की छूट वापस लेने वाली अधिसूचना 'निष्पक्षता के सिद्धांतों' पर खरी उतरी, क्योंकि “प्रतिवादी यह साबित नहीं कर पाए कि राज्य सरकार द्वारा लिया गया निर्णय किसी अप्रासंगिक विचार पर आधारित था, या यह स्पष्ट रूप से मनमाना था।”

इसके अलावा, अदालत ने यह भी टिप्पणी की,

“राज्य सरकार द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण—यानी सार्वजनिक राजस्व में वृद्धि करना और राजकोषीय बाधाओं को दूर करना—को न तो बाहरी (Extraneous) माना जा सकता है और न ही अतर्कसंगत।”

इसलिए अदालत ने यह फैसला सुनाया कि छूट को वापस लेने और उसमें संशोधन करने के निर्णय को न तो 'मनमाना' कहा जा सकता है और न ही 'अतर्कसंगत'।

न्यायालय ने निर्णय दिया,

“हम अधिनियम 25 की धारा 5A के तहत दी गई छूट को वापस लेने या उसमें संशोधन करने की राज्य सरकार की शक्ति को सही ठहराते हैं। यह निर्णय देते हैं कि दिनांक 01.04.2000 और 04.04.2001 की अधिसूचनाएँ, अपनी-अपनी तारीखों से एक वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद ही प्रभावी होंगी।”

तदनुसार, अपील स्वीकार कर ली गई।

Cause Title: THE STATE OF MAHARASHTRA & OTHERS VERSUS RELIANCE INDUSTRIES LTD. & OTHERS

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