जब प्रारंभिक डिक्री में विकल्प बताया गया हो कि भौतिक बंटवारा संभव नहीं है तो अंतिम डिक्री के लिए आवेदन ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (18 मई) को यह टिप्पणी की कि सिर्फ़ इसलिए कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XX नियम 18 के तहत अंतिम डिक्री पारित करने के लिए कोई अलग आवेदन दायर नहीं किया गया, कोई प्रारंभिक डिक्री लागू करने योग्य नहीं रह जाएगी; खासकर तब, जब डिक्री में ही यह प्रावधान हो कि यदि सीमाओं और माप के आधार पर बंटवारा संभव न हो, तो संपत्ति की नीलामी की जानी चाहिए - जिससे उस डिक्री को अंतिम डिक्री का भी दर्जा मिल जाता है।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की खंडपीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से जुड़े एक मामले की सुनवाई की। इस मामले में हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता के मुकदमे पर पारित बंटवारे की डिक्री के निष्पादन (लागू करने की प्रक्रिया) में दो बार हस्तक्षेप किया था। शुरुआत में, एक प्रारंभिक डिक्री पारित की गई, जिसमें कमिश्नर को पक्षों के बीच बंटवारा करने की व्यावहारिकता (Feasibility) की जांच करने का निर्देश दिया गया। प्रारंभिक डिक्री में कमिश्नर को यह जांचने का निर्देश दिया गया कि क्या मुकदमे वाली संपत्ति - जो एक आवासीय फ्लैट था - को सीमाओं और माप के आधार पर भौतिक रूप से विभाजित किया जा सकता है। आगे यह भी प्रावधान किया गया कि यदि ऐसा विभाजन संभव न हो, तो उचित मुआवज़ा या संपत्ति की बिक्री का सहारा लिया जा सकता है।
एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट के आधार पर निष्पादन न्यायालय (Executing Court) ने संपत्ति की सार्वजनिक नीलामी का आदेश दिया। उक्त रिपोर्ट में कहा गया कि फ्लैट का बंटवारा सीमाओं और माप के आधार पर नहीं किया जा सकता, क्योंकि संपत्ति का भौतिक विभाजन अव्यावहारिक है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इसमें हस्तक्षेप किया और यह माना कि यह डिक्री केवल एक प्रारंभिक डिक्री थी। इसलिए इसे तब तक लागू नहीं किया जा सकता, जब तक कि पहले एक अलग अंतिम डिक्री तैयार न कर ली जाए; जिसके चलते अपीलकर्ता को सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा।
विवादित फ़ैसला रद्द करते हुए जस्टिस भट्टी द्वारा लिखे गए फ़ैसले में यह टिप्पणी की गई कि हाईकोर्ट ने डिक्री के निष्पादन में हस्तक्षेप करके ग़लती की। यह ग़लती तब की गई, जब कमिश्नर की रिपोर्ट के आधार पर प्रारंभिक डिक्री ने ही अंतिम डिक्री का दर्जा प्राप्त कर लिया था। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि मुकदमे वाली संपत्ति का बंटवारा सीमाओं और माप के आधार पर अव्यावहारिक है।
न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि चूंकि प्रारंभिक डिक्री में ही पक्षों के बीच अधिकारों और हक़दारियों - जिसमें मध्यवर्ती लाभ (mesne profits) भी शामिल थे - का निपटारा कर दिया गया, इसलिए हाईकोर्ट द्वारा अपीलकर्ता से अंतिम डिक्री के लिए अलग से आवेदन की मांग करना अनुचित था। हाईकोर्ट ने इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर दिया कि सीमाओं और माप के आधार पर बंटवारा न हो पाने की स्थिति में प्रारंभिक डिक्री ही अंतिम डिक्री बन गई, क्योंकि उस समय पक्षों को उनका-उनका हिस्सा दिलाने के लिए मुकदमे वाली संपत्ति की खुली नीलामी ही एकमात्र शेष विकल्प बचा था।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“हाईकोर्ट जिस निष्कर्ष पर पहुंचा है, वह यह है कि इसे लागू करने से पहले एक अंतिम डिक्री (Final Decree) का होना ज़रूरी है। 13.04.2012 की डिक्री ने सभी उद्देश्यों के लिए कब्ज़े के अधिकार, मध्यवर्ती लाभ (mesne profits) और विषय-वस्तु (Subject Matter) की बिक्री में चूक होने की स्थिति में शेयरों को तय करने के तरीके और ढंग के संबंध में पहले विकल्प को निर्धारित किया था। अंतिम डिक्री पारित होने के बाद एक नया आवेदन दाखिल करने का निर्देश पूरी तरह से अनावश्यक है। इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में न्याय सुनिश्चित करने के लिए डिक्री की व्याख्या ऊपर बताए अनुसार ही की जानी चाहिए।”
परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की गई और नीलामी आयोजित करने तथा उसे पक्षों के बीच विभाजित करने के संबंध में निष्पादन न्यायालय (Executing Court) के निर्णय को बहाल कर दिया गया।
Cause Title: JENNIFER MESSIAS VERSUS LEONARD G LOBO