ECI हलफनामे से चुनाव में काले धन के लाखों मामले, किंतु सज़ा बहुत कम में हुई: सुप्रीम कोर्ट ने केस वापस लेने के लिए हाईकोर्ट की मंज़ूरी ज़रूरी की
चुनावों के दौरान काले धन के इस्तेमाल को रोकने के लिए निर्देश जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों और 2019 से 2025 के बीच हुए राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान ज़ब्ती और दर्ज FIR के बारे में दिए गए आंकड़ों पर ध्यान दिया।
यह डेटा जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच के सामने ECI द्वारा दायर हलफनामों में पेश किया गया। यह सुनवाई 2015 के कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ अपील पर हो रही थी, जिसमें प्रतिवादी के ख़िलाफ़ दर्ज FIR रद्द की गई। प्रतिवादी प्रतीक पारसरामपुरिया, 2014 के लोकसभा उपचुनाव में बेल्लारी से उम्मीदवार थे और उन पर आरोप है कि उन्होंने वोटरों को रिश्वत देने के लिए भारी मात्रा में नकदी जमा की थी।
आयोग द्वारा दायर हलफनामे से पता चलता है कि 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान दर्ज FIR के मामले में गुजरात (35,144) राज्यों की सूची में सबसे ऊपर है। इसके बाद उत्तर प्रदेश (19,209), महाराष्ट्र (18,928), पश्चिम बंगाल (17,493), राजस्थान (8,652), तेलंगाना (8,550), आंध्र प्रदेश (6,489), तमिलनाडु (5,106), पंजाब (4,869) और कर्नाटक (4,609) का नंबर आता है।
2024 के लोकसभा चुनाव के लिए भी गुजरात (52,820) सूची में सबसे ऊपर है, इसके बाद महाराष्ट्र (29,545), पश्चिम बंगाल (27,461), उत्तर प्रदेश (23,645), तेलंगाना (23,087), राजस्थान (12,746), कर्नाटक (7,588), तमिलनाडु (5,948) और आंध्र प्रदेश (5,043) हैं। 2019 और 2025 के बीच हुए विधानसभा चुनावों के डेटा से पता चलता है कि तेलंगाना के 2023 के चुनाव में सबसे ज़्यादा FIR (33,496) दर्ज की गईं; इसके बाद गुजरात का 2022 का चुनाव (30,253), महाराष्ट्र का 2024 का चुनाव (26,302), पश्चिम बंगाल का 2021 का चुनाव (25,061), उत्तर प्रदेश का 2022 का चुनाव (20,994) और महाराष्ट्र का 2019 का चुनाव (12,464) रहे। राजस्थान के 2023 के चुनाव (12,204), तमिलनाडु के 2021 के चुनाव (10,756), कर्नाटक के 2023 के चुनाव (8,440), पंजाब के 2022 के चुनाव (3,834) और केरल के 2021 के चुनाव (3,087) में तुलनात्मक रूप से कम संख्या दर्ज की गई।
चुनाव आयोग ने 15 नवंबर, 2025 को एक अतिरिक्त हलफ़नामा दायर किया, जिसमें इन FIR के नतीजों के बारे में बताया गया। 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान दर्ज 1,44,030 FIR में से, हलफ़नामा दायर करने की तारीख तक सिर्फ़ 1,348 मामलों की जांच चल रही थी, जबकि 26,990 मामलों में क्लोज़र रिपोर्ट (मामला बंद करने की रिपोर्ट) दाखिल की गई। 37,215 मामलों में सज़ा हुई, जबकि 36,312 मामलों में आरोपी बरी हो गए और 44,387 मामलों में ट्रायल अभी भी चल रहा था।
2024 के लोकसभा चुनाव के डेटा से पता चला कि दर्ज 3,87,430 FIR में से सिर्फ़ 7,930 मामलों की जांच चल रही थी, जबकि 76,987 मामलों में क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल की गई और 1,66,044 मामलों में सज़ा हुई। आयोग के हलफ़नामे में 42.9% (3,87,430 में से 1,66,044) की इस सज़ा दर को "काफ़ी सुधार" बताया गया। 24,950 मामलों में आरोपी बरी हो गए, जबकि 1,06,841 मामलों में ट्रायल अभी भी चल रहा है।
2019 और 2025 के बीच हुए राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान दर्ज 2,01,894 FIR में से सिर्फ़ 4,665 मामलों की जांच चल रही थी, जबकि 53,126 मामलों में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई। 40,155 मामलों में सजा हुई और 25,980 मामलों में आरोपी बरी हो गए। 79,148 मामलों में ट्रायल अभी भी लंबित है।
डेटा को देखते हुए कोर्ट ने चुनाव से जुड़े मुकदमों को सरकार बदलने के बाद एकतरफा तरीके से वापस लेने के बारे में आयोग की चिंता का भी ज़िक्र किया। इसके लिए आयोग द्वारा मुख्य सचिवों को भेजे गए उस संदेश का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि इस तरह मुकदमे वापस लेने से "गलत संदेश जाता है कि उपद्रवी बिना किसी डर के चुनावी गड़बड़ी और अपराध कर सकते हैं, क्योंकि बाद में उन मामलों को वापस लिया जा सकता है।"
एमिक्स क्यूरी (डॉ.) स्वप्निल त्रिपाठी ने कोर्ट के सामने 'चुनाव से जुड़े मामलों में वैश्विक तौर-तरीकों' पर एक नोट पेश किया, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, कनाडा और इंडोनेशिया समेत सोलह देशों/क्षेत्रों की स्थिति की तुलना की गई। इसमें बताया गया कि ज़्यादातर जगहों पर चुनाव से जुड़े अपराधों के मामलों में मुक़दमा चलाने या केस वापस लेने का फ़ैसला सिर्फ़ सरकारी वकील (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) करते हैं। इसमें चुनाव प्रबंधन संस्था की कोई भूमिका नहीं होती।
एमिक्स क्यूरी और चुनाव आयोग के सुझावों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों के दौरान काले धन के इस्तेमाल को रोकने के लिए कई निर्देश जारी किए। 'स्टेट ऑफ़ केरल बनाम के. अजित' और 'अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया' मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने किसी उम्मीदवार के ख़िलाफ़ मुक़दमा वापस लेने से पहले हाईकोर्ट की मंज़ूरी लेना ज़रूरी कर दिया। डेटा में लंबित मामलों को देखते हुए संबंधित अदालतों को निर्देश दिया गया कि वे मामलों को जल्द से जल्द तार्किक नतीजे तक पहुँचाने की पूरी कोशिश करें।
मुक़दमे वापस लेने के लिए हाईकोर्ट की मंज़ूरी ज़रूरी करने के ECI के सुझाव को मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
"निस्संदेह, यह सुझाव निष्पक्षता की दिशा में एक बड़ा कदम है; असल में, इससे चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार भी आपराधिक मुक़दमों के मामले में चुने हुए सांसदों और विधायकों के बराबर आ जाएँगे। हमारी नज़र में, यह उम्मीदवारों और संभावित उम्मीदवारों को यह संकेत देता है कि गलत तौर-तरीकों में शामिल होना कोई मामूली बात नहीं है। एक बार जब उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा शुरू हो जाता है तो सिर्फ़ राजनीतिक सत्ता बदलने से वे बच नहीं पाएँगे। दूसरे शब्दों में, एक संवैधानिक लोकतंत्र अपने प्रतिनिधियों से नैतिक ईमानदारी और सच्चाई के उसी स्तर की उम्मीद करता है।"
सुप्रीम कोर्ट ने भारत के चुनाव आयोग और संबंधित सरकारों को 18 नवंबर, 2026 तक या उससे पहले अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) दाखिल करने का निर्देश दिया।
Case Title: State of Karnataka & Anr. v Prathik Parasrampuria