'फोरम नॉन कन्वेनियंस' का सिद्धांत आर्टिकल 226(1) के तहत रिट अधिकार क्षेत्र को अस्वीकार करने का शायद ही कभी आधार बनता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'फोरम नॉन कन्वेनियंस' का सिद्धांत आमतौर पर तब लागू नहीं होगा, जब कोई वादी संविधान के आर्टिकल 226(1) के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करता है। यह आर्टिकल उस हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आने वाले अधिकारियों के खिलाफ रिट याचिका दायर करने की अनुमति देता है।
'फोरम नॉन कन्वेनियंस' का सिद्धांत किसी ऐसी अदालत को, जिसके पास विवाद पर सुनवाई का अधिकार क्षेत्र है, मामले की सुनवाई से इनकार करने की अनुमति देता है यदि किसी अन्य अदालत को मामले के निपटारे के लिए अधिक उपयुक्त या सुविधाजनक माना जाता है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 226 के तहत कार्यवाही में इस सिद्धांत का सीमित अनुप्रयोग है। यह शायद ही कभी हाईकोर्ट द्वारा आर्टिकल 226(1) के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए दायर रिट याचिका पर सुनवाई से इनकार करने को सही ठहराएगा।
कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट का वह फैसला रद्द किया, जिसमें बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) के कॉन्स्टेबल द्वारा नौकरी से बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार करने के लिए इस सिद्धांत का इस्तेमाल किया गया और मामले के गुण-दोष पर विचार करने के लिए रिट याचिका बहाल की।
कोर्ट ने कहा कि हालांकि यह सिद्धांत तब लागू होता है, जब वादी के पास कई अदालतें (फोरम) उपलब्ध हों, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने आर्टिकल 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र के संदर्भ में इसका गलत इस्तेमाल किया।
कोर्ट ने कहा,
"हमारी राय में संविधान के आर्टिकल 226 से संबंधित रिट अधिकार क्षेत्र के संदर्भ में डिवीजन बेंच द्वारा 'फोरम नॉन कन्वेनियंस' सिद्धांत का गलत इस्तेमाल किया गया। ऐसा आर्टिकल प्रतिवादी (प्रतिवादियों) के कार्यालय की स्थिति [क्लॉज (1)] और कार्रवाई के कारण [क्लॉज (2)] के अनुसार रिट याचिका दायर करने की अनुमति देता है, जो कार्रवाई का अधिकार देता है। जहां संवैधानिक उपाय अपनाने का सवाल हो और रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल आर्टिकल 226 के क्लॉज (1) से जुड़ा हो, वहां 'फोरम नॉन कन्वेनियंस' का सिद्धांत शायद ही कभी लागू हो सकता है।"
यह मामला BSF कॉन्स्टेबल बख्शीश अहमद के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही से उत्पन्न हुआ था। बाद में उन्हें बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स रूल्स, 1969 और सेंट्रल सिविल सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स, 1964 के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
निर्धारित समय के भीतर जवाब दाखिल करने में विफल रहने के बाद कमांडेंट ने उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया। BSF नियमों के नियम 28A के तहत उनकी कानूनी याचिका को बाद में इंस्पेक्टर जनरल, फ्रंटियर हेडक्वार्टर, BSF, जम्मू ने खारिज कर दिया।
अपीलकर्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट में दोनों आदेशों को चुनौती दी। हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया। कोर्ट ने माना कि संबंधित घटनाएं या तो पश्चिम बंगाल में हुईं, जहां बर्खास्तगी का आदेश जारी किया गया, या जम्मू-कश्मीर में, जहां कानूनी याचिका खारिज की गई। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दिल्ली सही जगह (फोरम कन्वेनियंस) नहीं है और उचित हाईकोर्ट में जाने की छूट देते हुए रिट याचिका खारिज की।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने 'अबरार अली बनाम CISF' मामले में कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि दिल्ली हाईकोर्ट के पास अनुच्छेद 226(1) के तहत अधिकार क्षेत्र है क्योंकि CISF का मुख्यालय दिल्ली में स्थित है।
सुप्रीम कोर्ट इस बात से सहमत था कि दिल्ली हाईकोर्ट के पास क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र था। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 226(1) हाईकोर्ट को अपनी क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर स्थित अधिकारियों के खिलाफ रिट जारी करने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 226(2) वहां अधिकार क्षेत्र देता है जहां कार्रवाई का कारण पूरी तरह या आंशिक रूप से उत्पन्न होता है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चूंकि भारत संघ और डायरेक्टर जनरल, BSF आवश्यक पक्ष थे और उनके कार्यालय दिल्ली में स्थित थे, इसलिए दिल्ली हाई कोर्ट रिट याचिका पर सुनवाई करने के लिए सक्षम था।
'फोरम नॉन कन्वेनियंस' (असुविधाजनक अदालत) के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपील करने वाला व्यक्ति कलकत्ता हाईकोर्ट भी जा सकता है, क्योंकि कारण बताओ नोटिस और बर्खास्तगी का आदेश पश्चिम बंगाल में जारी किया गया; या जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट जा सकता है, क्योंकि वहां वैधानिक याचिका खारिज की गई; या इलाहाबाद हाईकोर्ट जा सकता है, क्योंकि कथित कदाचार उत्तर प्रदेश में हुआ था। फिर भी, कोर्ट ने कहा कि इन अदालतों के मौजूद होने का मतलब यह नहीं था कि दिल्ली हाईकोर्ट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से इनकार कर दे।
कोर्ट ने देखा कि 'रिट ऑफ़ सर्टिओरारी' (निर्णय की समीक्षा की रिट) की कार्यवाही में संबंधित रिकॉर्ड आमतौर पर प्रतिवादी अधिकारियों के पास उपलब्ध होते हैं और उन्हें आसानी से कोर्ट के सामने पेश किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थितियों में प्रतिवादियों की लोकेशन के आधार पर चुने गए फोरम से किसी वादी को दूर भेजना न्याय तक पहुंच में बाधा डाल सकता है।
कोर्ट ने कहा,
"जब 'सर्टिओरारी' या उसके जैसी रिट की मांग की जाती है तो 'रूल निसी' के तहत मामले के रिकॉर्ड को कोर्ट के सामने रखना ज़रूरी होता है ताकि यह जांचा जा सके कि क्या चुनौती दिया गया आदेश (जो रिकॉर्ड का हिस्सा है) 'सर्टिओरारी' या उसके जैसी रिट के ज़रिए रद्द किए जाने लायक है या नहीं। ऐसे रिकॉर्ड हमेशा प्रतिवादियों के कार्यालयों में उपलब्ध होंगे; यदि नहीं, तो उन्हें उनके कस्टोडियन (रख-रखाव करने वाले) से आसानी से मंगाया जा सकता है। जब वादी ने खुद ही प्रतिवादियों के लिए सुविधाजनक फोरम चुना हो तो 'फोरम नॉन कन्वेनियंस' के सिद्धांत को लागू करना खुद के मकसद को नाकाम करने जैसा हो सकता है और इससे न्याय को आगे बढ़ाने के बजाय न्याय तक पहुंच से वंचित किए जाने की संभावना हो सकती है।"
Case: Baksish Ahmad v. Union of India & Anr.