अनुशासनात्मक प्राधिकारी बिना नए कारण बताओ नोटिस के कर्मचारी को ऐसे आरोप के लिए दंडित नहीं कर सकता, जो मूल रूप से तय नहीं किया गया: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-07 05:30 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (6 मई) को फैसला सुनाया कि कोई भी दोषी कर्मचारी, जिसने अपने ऊपर लगे आरोप का सफलतापूर्वक बचाव किया, उसे किसी ऐसे नए आरोप के आधार पर सेवामुक्त नहीं किया जा सकता, जिसके बचाव का उसे अवसर ही न दिया गया हो।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने रिटायर बाल रोग विशेषज्ञ द्वारा दायर अपील पर सुनवाई की। इस विशेषज्ञ को, पटना मेडिकल कॉलेज में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के निरीक्षण के दौरान जमा किए गए एक घोषणा पत्र में यह जानकारी छिपाने के कारण तीन महीने के लिए 'इंडियन मेडिकल रजिस्टर' से प्रतिबंधित किया गया कि वह पहले किसी अन्य संस्थान में संकाय सदस्य (फैकल्टी मेंबर) के रूप में कार्य कर चुके हैं।

शुरुआत में अपीलकर्ता को 'फर्जी संकाय घोषणा पत्र' जमा करने के आरोप में नोटिस जारी किया गया, जिसका उन्होंने 'आचार समिति' (Ethics Committee) के समक्ष सफलतापूर्वक बचाव किया। हालांकि, जब इस मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेजा गया तो उन्हें 'जानकारी छिपाने' (act of omission) का दोषी पाया गया। यह आरोप मूल आरोप—यानी फर्जी संकाय घोषणा पत्र जमा करने—से पूरी तरह भिन्न था।

आचार समिति का आदेश बरकरार रखने वाले 'मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया' (MCI) के निर्णय से व्यथित होकर उन्होंने पटना हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।

सिंगल जज ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। हालांकि, एक 'अंतः-न्यायालय अपील' (intra-court appeal) में 'खंडपीठ' (Division Bench) ने सिंगल बेंच के फैसले को पलट दिया, जिसके परिणामस्वरूप यह मामला अपील के रूप में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

हाईकोर्ट के आदेश के उस हिस्से से असहमति जताते हुए, जिसमें MCI के उस निर्णय को सही ठहराया गया, जिसके तहत अपीलकर्ता को एक ऐसे नए आरोप के आधार पर दोषी माना गया, जिसके बचाव का उसे कोई अवसर नहीं दिया गया, जस्टिस दत्ता द्वारा लिखे गए निर्णय में 'रवि उरांव बनाम झारखंड राज्य, 2025 LiveLaw (SC) 1009' मामले का संदर्भ दिया गया। उस मामले में यह टिप्पणी की गई कि, "एक बार जब कोई दोषी कर्मचारी किसी आरोप का सफलतापूर्वक बचाव कर लेता है तो अनुशासनात्मक प्राधिकारी, बिना कोई नया 'कारण बताओ नोटिस' जारी किए, उस कर्मचारी को किसी ऐसे पूर्णतः भिन्न आरोप के लिए दंडित नहीं कर सकता, जो मूल रूप से तय ही न किया गया हो।"

अदालत ने कहा,

“कार्यकारी समिति बिना कोई नया कारण बताओ नोटिस जारी किए और/या डॉ. नारायण (अपीलकर्ता) को विचाराधीन नए/वैकल्पिक आरोप का जवाब देने का उचित और तर्कसंगत अवसर दिए बिना सज़ा नहीं दे सकती थी। हम पूरी तरह से इस बात को मानते हैं कि कार्यकारी समिति का निर्णय, इस हद तक, एक गंभीर दोष से ग्रस्त है।”

इस तथ्य के बावजूद कि अपीलकर्ता को नए आरोप के बचाव के लिए सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया गया, अदालत ने अपीलकर्ता के आचरण पर भी सवाल उठाया, क्योंकि वह घोषणा पत्र में अपने पिछले कार्यस्थल के साथ अपने पिछले जुड़ाव के बारे में की गई चूक को समझाने में विफल रहा था।

अदालत ने टिप्पणी की,

“हालांकि, इस तरह के दोष के बावजूद, इस तथ्य को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि डॉ. नारायण यह समझाने में विफल रहे हैं—किसी भी हद तक ठोस रूप से—कि वह गलत घोषणा क्यों और कैसे की गई, जिसका आरोप कार्यकारी समिति के 21 जुलाई, 2016 के आदेश में लगाया गया। इस तरह की बेशर्मी भरी गलत घोषणा को समझाने में विफलता अपने आप में (ipso facto), ऐसी गलत घोषणा को कदाचार मानने का आधार प्रदान करती है। डॉ. नारायण की ओर से की गई ऐसी गलत घोषणा को कार्यकारी समिति द्वारा माफ़ नहीं किया जा सकता था।”

अपीलकर्ता की 76 वर्ष की आयु को ध्यान में रखते हुए अदालत उस पर लगाई गई सज़ा बरकरार रखने के पक्ष में नहीं थी। इसके बजाय, संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग करते हुए उसने उसकी सज़ा को—इंडियन मेडिकल रजिस्टर से उसका नाम 3 महीने के लिए हटाने से घटाकर—एक निंदा/चेतावनी जारी करने तक सीमित किया।

उपर्युक्त शर्तों के आधार पर अपील स्वीकार की गई।

Cause Title: DR. NIGAM PRAKASH NARAIN VS. NATIONAL MEDICAL COMMISSION & ORS.

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