सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब बचाव पक्ष का आधार पहले से रिकॉर्ड पर मौजूद किसी निर्विवाद दस्तावेज़ पर टिका हो, तो प्रतिवादी को गवाह के कटघरे में जाने की ज़रूरत नहीं है।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने उस मामले की सुनवाई की, जिसमें अपीलकर्ता-वादी ने प्रतिवादी-किरायेदार के खिलाफ़ अनिवार्य निषेधाज्ञा और कब्ज़े का मुकदमा दायर किया। वादी का दावा था कि वह संपत्ति का मालिक है और उसने प्रतिवादी को लाइसेंसधारी के तौर पर संपत्ति का इस्तेमाल करने की इजाज़त दी।

ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता का मुकदमा खारिज कर दिया, क्योंकि रेवेन्यू रिकॉर्ड में प्रतिवादी को 'किरायेदार' दिखाया गया।

पहली अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। उसने प्रतिवादी के खिलाफ़ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला, क्योंकि प्रतिवादी गवाह के कटघरे में नहीं गया।

हाईकोर्ट ने पहली अपीलीय अदालत के फैसले को पलट दिया।

हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर वादी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। उसने तर्क दिया कि चूंकि प्रतिवादी गवाह के कटघरे में नहीं गया, इसलिए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले और डिक्री को बहाल करके गलती की।

विवादित आदेश को सही ठहराते हुए कोर्ट ने कहा कि चूंकि रेवेन्यू रिकॉर्ड से यह बात साबित होती है कि प्रतिवादी अपीलकर्ता का किरायेदार था, इसलिए प्रतिवादी को गवाह के कटघरे में जाकर इस दावे को साबित करने की ज़रूरत नहीं थी।

कोर्ट ने कहा,

"रेवेन्यू रिकॉर्ड साफ तौर पर बताते हैं कि प्रतिवादी 1965 से किरायेदार था। ऐसे मामले में प्रतिवादी (जो बचाव पक्ष है) को गवाह के कटघरे में जाने की कोई ज़रूरत नहीं है। गवाह के कटघरे में जाने की ज़रूरत तभी पड़ती है जब किसी पक्ष द्वारा बताए गए नए तथ्य को साबित करना हो।"

नतीजतन, अपील खारिज कर दी गई। कोर्ट ने इस मामले में एमिक्स क्यूरी (न्याय मित्र) एडवोकेट अवस्तिका दास से मिली बेहतरीन मदद की सराहना की।

Cause Title: PUNNU RAM VERSUS LATURIA RAM DEAD TH. LRS.

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