जिन दोषियों को सिर्फ़ जुर्माने की सज़ा मिली, वे भी 'अपराधी परिवीक्षा अधिनियम' के फ़ायदे के हकदार: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि जिन अपराधियों को सिर्फ़ जुर्माना भरने की सज़ा दी गई, उन्हें भी 'अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958' की धारा 4 के तहत परिवीक्षा (प्रोबेशन) का फ़ायदा दिया जा सकता है।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने उन दोषियों को रिहा करने का आदेश दिया, जिन्हें मारपीट के आरोप में IPC की धारा 34 के साथ पढ़ी जाने वाली धाराओं 323 और 324 के तहत दोषी ठहराया गया। साथ ही उन्हें बिना किसी ठोस सज़ा के, सिर्फ़ 500 से 2,000 रुपये का जुर्माना भरने की सज़ा दी गई।
कोर्ट ने 1958 के अधिनियम की धारा 4 के तहत 'रिहाई' शब्द की 'संकीर्ण' व्याख्या खारिज की।
कोर्ट ने कहा,
"'रिहाई' का मतलब सिर्फ़ हिरासत से रिहा होना नहीं हो सकता। इसे जुर्माने की सज़ा भुगतने की बाध्यता से मुक्त होने के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।"
कोर्ट ने कहा कि दंड विधि के तहत 'जुर्माना' अपने आप में सज़ा का एक रूप है। इसलिए इस क़ानून के तहत 'रिहाई' में ऐसी सज़ा भुगतने की बाध्यता से मुक्ति भी शामिल है।
यह मामला एक स्थानीय झगड़े से जुड़ा था, जिसमें आरोपियों को मारपीट के आरोप में IPC की धारा 34 के साथ पढ़ी जाने वाली धाराओं 323 और 324 के तहत दोषी ठहराया गया।
ट्रायल कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट दोनों ने ही दोषियों पर सिर्फ़ जुर्माना (500 से 2,000 रुपये) लगाया था, और उन्हें कोई ठोस कारावास की सज़ा नहीं दी थी। सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ताओं ने अपनी दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी, बल्कि 1958 के अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत परिवीक्षा का फ़ायदा मांगा।
राज्य सरकार ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि चूंकि इसमें कारावास की कोई सज़ा नहीं थी, इसलिए धारा 4 के तहत 'रिहाई' की अवधारणा लागू नहीं होती। हालांकि, कोर्ट ने इस संकीर्ण व्याख्या को पूरी तरह से खारिज किया।
कोर्ट ने कहा,
"1958 के अधिनियम में 'सज़ा' के किसी भी संदर्भ की व्याख्या IPC की धारा 53 और BNS की धारा 4 में दी गई सूची के अनुसार की जानी चाहिए। इसमें निस्संदेह 'जुर्माना' भी शामिल होना चाहिए... इस प्रकार, 1958 के अधिनियम की धारा 4 का फ़ायदा उस अपराधी को भी उपलब्ध है, जिसे सिर्फ़ जुर्माना भरने की सज़ा दी गई।"
अदालत ने आगे कहा,
“1958 के अधिनियम की धारा 4 में प्रयुक्त शब्द 'रिहाई' (Release) का अर्थ यह समझा जाना चाहिए कि इसके तहत अपराधी को सज़ा—भले ही वह केवल जुर्माने के रूप में ही क्यों न हो—से मुक्त कर दिया जाता है।”
उपर्युक्त बातों के आधार पर अदालत ने अपील का निपटारा करते हुए यह निर्देश दिया कि अपीलकर्ताओं को अच्छे आचरण और निगरानी की शर्तों को पूरा करने के अधीन, परिवीक्षा (Probation) पर रिहा कर दिया जाए।
Cause Title: MILIND S/O ASHRUBA DHANVE AND ORS. VERSUS THE STATE OF MAHARASHTRA