सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत पूरा हो चुका ट्रायल सिर्फ़ इस आधार पर दोबारा सुनवाई के लिए नहीं भेजा जा सकता कि बचाव पक्ष के सबूतों से जुड़ी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, खासकर तब जब आरोपी ने यह साबित न किया हो कि उसे इससे कोई नुकसान या भेदभाव (prejudice) हुआ है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने केरल हाईकोर्ट का वह फैसला रद्द किया, जिसमें बचाव पक्ष के सबूतों के चरण से नया ट्रायल शुरू करने का आदेश दिया गया था, जबकि आरोपी ने ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय अदालत के सामने खुद को हुए नुकसान या भेदभाव के बारे में कोई तर्क नहीं दिया।

अपीलकर्ता चेक-बाउंस मामले में शिकायतकर्ता था। आरोपी का दावा कि उसने ₹10 लाख के लोन के लिए सिक्योरिटी के तौर पर एक साइन किया हुआ खाली चेक दिया, जबकि चेक को ₹30 लाख के लिए पेश किया गया।

उसने यह भी दावा किया कि जब कथित पेमेंट और चेक जारी करने की घटना हुई तो शिकायतकर्ता उस जगह पर मौजूद नहीं था। हालांकि, शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया। मजिस्ट्रेट ने कहा कि आरोपी इस दावे के समर्थन में शिकायतकर्ता के कॉल डेटा रिकॉर्ड पेश कर सकता था।

आरोपी ने ट्रायल कोर्ट या पहली अपीलीय अदालत के सामने किसी भी तरह के नुकसान या भेदभाव का आरोप नहीं लगाया।

इसके बावजूद, हाईकोर्ट ने मामले को बचाव पक्ष के सबूतों के चरण से नए सिरे से सुनवाई के लिए भेज दिया। हाईकोर्ट ने M/s मांडवी कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम निमेश बी. ठाकोर (2010) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जो NI Act की धारा 145 के दायरे से संबंधित था।

बेंच ने बताया कि मांडवी कोऑपरेटिव बैंक मामले में NI Act की धारा 145 की व्याख्या की गई और यह कहा गया कि जहां शिकायतकर्ता का मुख्य बयान (एग्जामिनेशन-इन-चीफ) हलफनामे के जरिए दिया जा सकता है, वहीं आरोपी को उसी तरह हलफनामे पर सबूत देने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।

हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आपराधिक मामले में इस सिद्धांत को लागू करते समय इस बात का खास ध्यान रखा जाना चाहिए कि पूरे हो चुके ट्रायल में आरोपी को कोई नुकसान या भेदभाव तो नहीं हुआ। इस मामले में, क्योंकि आरोपी ने ट्रायल कोर्ट या पहली अपील कोर्ट के सामने कभी भी पक्षपात का आरोप नहीं लगाया। चेक पर अपने हस्ताक्षर को स्वीकार किया। साथ ही NI Act के तहत कानूनी अनुमान (Statutory Presumption) को गलत साबित करने में भी नाकाम रहा था, इसलिए कोर्ट को मामले को वापस भेजने (रिमांड) का कोई आधार नहीं मिला।

कोर्ट ने कहा,

“आरोपी ने ट्रायल कोर्ट या पहली अपील कोर्ट के सामने कभी भी पक्षपात का आरोप नहीं लगाया। हस्ताक्षर स्वीकार किए गए और कानूनी अनुमान पूरी तरह से लागू होता है, जिसे गलत साबित नहीं किया गया... हमारी राय में हाईकोर्ट के सामने आरोपी ने वकील की चतुराई के कारण एक ऐसी दलील दी, जिसे सिंगल जज ने गलत तरीके से मान लिया। इस मामले में पक्षपात का मुद्दा नदारद है और यह बात साफ तौर पर दिखती है।”

इसके बाद हाईकोर्ट का रिमांड आदेश रद्द किया गया और आपराधिक पुनरीक्षण (Criminal Revision) याचिका को हाईकोर्ट की फाइल में उसके गुण-दोष के आधार पर विचार करने के लिए बहाल कर दिया गया।

Cause Title: Sanu Varghese Versus Shoukkathali

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