बच्चों को 'सेफ'-'अनसेफ' टच के बारे में सिखाया जाना चाहिए; शिक्षकों को 'ग्रूमिंग' और दुर्व्यवहार की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से सेक्स एजुकेशन और डिजिटल सुरक्षा पाठ्यक्रम के तहत उनके शरीर, 'सेफ' (सुरक्षित) और 'अनसेफ' (असुरक्षित) टच के बीच के अंतर, और 'सहमति' (Consent) के महत्व के बारे में शुरुआती स्तर से ही सिखाया जाना चाहिए।
कोर्ट ने स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों को यह भी निर्देश दिया कि वे हर क्लासरूम, हॉस्टल, लाइब्रेरी और कंप्यूटर लैब में बाल सुरक्षा हेल्पलाइन नंबर प्रदर्शित करें। साथ ही शिक्षकों और अन्य स्टाफ को 'ग्रूमिंग' (बच्चों को बहला-फुसलाकर गलत काम के लिए तैयार करना), दुर्व्यवहार और ऑनलाइन उत्पीड़न की पहचान करने के लिए प्रशिक्षित करें, ताकि अगर कोई बच्चा किसी घटना के बारे में बताए तो वे सही तरीके से कदम उठा सकें।
कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को यह भी निर्देश दिया कि वे बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार के खिलाफ लगातार जन-जागरूकता अभियान चलाएं। साथ ही ऐसी व्यवस्था बनाएं जिससे पीड़ितों को जरूरत पड़ने तक मुफ्त काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता और थेरेपी मिल सके।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने ये निर्देश तब दिए, जब वे ऑनलाइन फैलने वाली बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री (CSEAM) को रोकने के लिए किए गए सुरक्षा उपायों के क्रियान्वयन की जांच कर रहे थे।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों को खतरों को पहचानने, गलत व्यवहार को समझने और यह जानने में सक्षम होना चाहिए कि उन्हें मदद के लिए कहां जाना है। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल सुरक्षा के प्रति जागरूकता और सेक्स एजुकेशन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
कोर्ट ने कहा,
"हमारा मानना है कि डिजिटल सुरक्षा और सेक्स एजुकेशन कोई अलग-अलग विषय नहीं हैं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और इन्हें इसी तरह देखा जाना चाहिए। बच्चों को कम उम्र से ही यह पता होना चाहिए कि उन्हें किन लोगों से मिलना-जुलना चाहिए। उन्हें यह समझ होनी चाहिए कि कोई गलत मांग, इशारा या अनुचित व्यवहार क्या होता है। उन्हें अपने और अपने आस-पास के लोगों के सम्मान (Dignity) का महत्व पता होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर कोई दुर्भाग्यपूर्ण या गलत घटना घटती है तो उन्हें पता होना चाहिए कि मदद के लिए किसके पास जाना है। ये सभी बातें बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के साथ-साथ उनके वास्तविक जीवन की सुरक्षा के लिए भी बहुत जरूरी हैं।"
ये निर्देश केवल आपत्तिजनक सामग्री का पता लगाने और उसे हटाने वाली तकनीकी व्यवस्थाओं तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और भलाई को बेहतर बनाने के लिए अन्य जरूरी उपायों पर भी ध्यान देते हैं। बच्चों को 'सेफ' और 'अनसेफ' टच तथा 'सहमति' (consent) के बारे में सिखाया जाना चाहिए
अदालत ने निर्देश दिया कि बच्चों को प्राइमरी स्तर से ही, उनकी उम्र के हिसाब से उनके शरीर, 'सेफ' और 'अनसेफ' टच के बीच के अंतर, और 'सहमति' (consent) के महत्व के बारे में सिखाया जाए।
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि बच्चों में स्वस्थ रिश्तों और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की समझ विकसित होनी चाहिए।
अदालत ने कहा,
"बच्चों में स्वस्थ रिश्तों और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की समझ पैदा करना बहुत जरूरी है। अनुभव से पता चला है कि कई बार बच्चे खुद ही अपने साथियों की निजी या बिना सहमति के ली गई तस्वीरें ले लेते हैं, उन्हें अपलोड कर देते हैं या फैला देते हैं। अक्सर उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं होता कि वे कितना गंभीर काम कर रहे हैं। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि उन्हें अपने साथियों की गरिमा का सम्मान करना सिखाया जाए और किसी भी तरह के गलत व्यवहार के प्रति सावधान किया जाए।"
बच्चों को इंटरनेट के सुरक्षित इस्तेमाल, अपने निजी डेटा और प्राइवेसी की सुरक्षा और बहलाने-फुसलाने, यौन शोषण (Sexual Extortion) या अन्य प्रकार के शोषण और दुर्व्यवहार के संकेतों को पहचानने के बारे में भी शिक्षित किया जाना चाहिए।
अदालत ने जोर दिया कि बच्चों को पता होना चाहिए कि ऐसी स्थितियों में वे किससे मदद मांग सकते हैं - जैसे घर या स्कूल में कोई भरोसेमंद वयस्क। उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि ऑनलाइन या ऑफलाइन होने वाले गलत व्यवहार या घटनाओं की शिकायत कहाँ और कैसे की जा सकती है।
अदालत ने कहा कि बच्चों को बिना किसी डर के ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्हें यह भरोसा दिलाया जाना चाहिए कि अपनी बात रखने पर उन्हें डांट नहीं पड़ेगी, बल्कि उन्हें पूरी गोपनीयता (Confidentiality) के साथ मदद और सहयोग मिलेगा।
अदालत ने निर्देश दिया कि बच्चों को 'प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस' एक्ट (POCSO Act) और 'इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी' एक्ट (IT Act) के महत्व के बारे में बताया जाए। इसमें विशेष रूप से उन प्रावधानों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए, जिनके तहत बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री (CSEAM) को देखना, अपने पास रखना या फैलाना एक अपराध है। साथ ही, उन्हें इन कानूनों के तहत मिलने वाले अपने अधिकारों के बारे में भी पता होना चाहिए।
डिजिटल सुरक्षा और सेक्स एजुकेशन मुख्य पाठ्यक्रम (Core Curriculum) का हिस्सा होंगे
अदालत ने निर्देश दिया कि डिजिटल सुरक्षा और उम्र के हिसाब से सेक्स एजुकेशन को मुख्य पाठ्यक्रम (Core Curriculum) का हिस्सा बनाया जाए। इस पाठ्यक्रम को 'नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग' (NCERT) और 'स्टेट काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग' (SCERTs) द्वारा तैयार किया जाना चाहिए। इसे बनाते समय बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों और पैरेंटिंग विशेषज्ञों से सलाह ली जानी चाहिए। इस सामग्री में देश भर में साक्षरता के अलग-अलग स्तरों को ध्यान में रखा जाना चाहिए और इसमें टेक्स्ट-आधारित कोर्स, चित्रों, दृष्टांतों और ऑडियो-विज़ुअल कंटेंट का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
अदालत ने गौर किया कि बच्चे अक्सर इंटरनेट के खतरों को समझे बिना ही इसका इस्तेमाल शुरू कर देते हैं। इन खतरों में अजनबियों का दोस्त बनकर सामने आना, मासूम बातचीत की आड़ में अनुचित मांगें रखना, और बच्चों को फंसाने के लिए ऑनलाइन गतिविधियों का इस्तेमाल किया जाना शामिल है।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि इंटरनेट को सुरक्षित बनाने के लिए बनाए गए सुरक्षा उपाय तब तक बेअसर रहेंगे, जब तक कि बच्चों को उन खतरों की जानकारी न हो जिनका वे सामना कर सकते हैं, या उन्हें यह न पता हो कि वे खुद को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं।
क्लासरूम में हेल्पलाइन नंबर दिखें, स्कूलों में कंटेंट फिल्टर लगाए जाएं
अदालत ने निर्देश दिया कि चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098, साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930, नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल और राज्य-वार नोडल अधिकारियों की जानकारी हर क्लासरूम, हॉस्टल, लाइब्रेरी और कंप्यूटर लैब में लगाई जानी चाहिए। यह जानकारी हर स्कूल और शैक्षणिक संस्थान की वेबसाइट पर भी होनी चाहिए।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों के डिवाइस और नेटवर्क में ऐसे फिल्टर लगाए जाएं, जो हानिकारक कंटेंट तक पहुंच को उचित और संतुलित तरीके से रोक सकें।
अदालत ने आदेश दिया कि इन उपायों को हॉस्टल, चाइल्डकेयर संस्थानों, ट्यूशन सेंटरों और कोचिंग सेंटरों में और भी सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
शिक्षकों को 'ग्रूमिंग' (बच्चों को बहला-फुसलाकर फंसाने) की पहचान करने और ऐसी घटनाओं के सामने आने पर उचित प्रतिक्रिया देने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
अदालत ने निर्देश दिया कि शिक्षकों और स्कूल के अन्य कर्मचारियों को डिजिटल सुरक्षा और उम्र के हिसाब से सही 'पॉजिटिव सेक्स एजुकेशन' (यौन शिक्षा) के बारे में पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
अदालत ने जोर देकर कहा कि इस प्रशिक्षण में 'ग्रूमिंग', दुर्व्यवहार और ऑनलाइन उत्पीड़न के संकेतों की पहचान करना शामिल होना चाहिए। साथ ही इसमें यह भी बताया जाना चाहिए कि जब कोई बच्चा किसी घटना के बारे में बताए, तो शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए। इसके अलावा, POCSO Act के तहत रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी और बच्चे की पहचान को गोपनीय रखने की आवश्यकता के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए।
POCSO Act की धारा 19 के तहत यदि किसी व्यक्ति को यह संदेह हो या जानकारी मिले कि कोई POCSO अपराध हुआ है, या होने की संभावना है, तो उसे 'स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट' (विशेष किशोर पुलिस इकाई) या स्थानीय पुलिस को इसकी रिपोर्ट देनी होगी। धारा 21 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति इस एक्ट के तहत जरूरी रिपोर्ट दर्ज नहीं करता है, तो उसे एक साल तक की जेल और/या जुर्माने की सजा हो सकती है। माता-पिता को ऑनलाइन जोखिमों और पैरेंटल कंट्रोल के बारे में प्रशिक्षित किया जाएगा
अदालत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा के मामले में माता-पिता और अभिभावक ही बचाव की पहली पंक्ति होते हैं, लेकिन कई माता-पिता खुद उस तकनीक के बारे में नहीं जानते, जिसका इस्तेमाल उनके बच्चे करते हैं।
अदालत ने स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों को निर्देश दिया कि वे समय-समय पर माता-पिता और अभिभावकों के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करें।
इन कार्यक्रमों में बच्चों को ऑनलाइन होने वाले खतरों, डिवाइस और प्लेटफॉर्म पर मौजूद पैरेंटल कंट्रोल और सुरक्षा सेटिंग्स, बच्चे के परेशान होने के संकेतों और ऐसी स्थिति में सही तरीके से प्रतिक्रिया देने के तरीकों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि माता-पिता को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नज़र रखने के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उनकी निगरानी से बच्चों के साथ अविश्वास या गलतफहमी पैदा न हो।
सरकारों को लगातार जागरूकता अभियान चलाने होंगे
अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे 'बाल अधिकार संरक्षण आयोगों' (Commissions for Protection of Child Rights) के साथ मिलकर POCSO Act और बच्चों के शोषण व दुर्व्यवहार के विभिन्न रूपों के बारे में जागरूकता फैलाएं। इसमें विशेष रूप से डिजिटल माध्यमों से होने वाले शोषण (जैसे CSEAM) को शामिल किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि ये जागरूकता अभियान रुक-रुक कर नहीं, बल्कि लगातार चलने चाहिए। इन्हें टेलीविजन, सोशल मीडिया, टेलीकॉम चैनलों, SMS, OTT प्लेटफॉर्म, प्रिंट मीडिया और सार्वजनिक स्थानों पर लगे साइनबोर्ड के जरिए लोगों तक पहुँचाया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि सरकारों और बाल अधिकार आयोगों को सभी संबंधित पक्षों (स्टेकहोल्डर्स) के बीच बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के उपायों, और इसके लिए उपलब्ध हेल्पलाइन व सपोर्ट पोर्टल के बारे में जागरूकता बढ़ानी चाहिए। माता-पिता, अभिभावकों, शिक्षकों और बच्चों की देखभाल करने वाले अन्य लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि अगर बच्चों के साथ शोषण या दुर्व्यवहार की कोई घटना होती है तो उन्हें सही तरीके से कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को बच्चों को अनजान वयस्कों के संपर्क में आने के खतरों के बारे में चेतावनी देनी चाहिए।
अदालत ने ऑनलाइन मध्यस्थों (Intermediaries) को यह भी निर्देश दिया कि वे समय-समय पर बच्चों को अपने प्लेटफॉर्म्स के सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में याद दिलाएं। साथ ही उन्हें उपलब्ध सेफ्टी सेंटर्स, प्राइवेसी सेटिंग्स और मदद के विकल्पों के बारे में भी जानकारी दें।
जब कोई बच्चा किसी अनजान वयस्क से जुड़ने, उसे मैसेज भेजने या बातचीत करने की कोशिश करे तो प्लेटफॉर्म्स पर चेतावनी देने वाले संदेश (Cautionary Prompts) दिखने चाहिए। इसके अलावा, अगर कोई यूज़र CSEAM (बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री) से जुड़ा कोई सर्च टर्म या क्वेरी डालता है, तो भी उचित चेतावनी दिखाई जानी चाहिए।
पीड़ितों को मुफ्त काउंसलिंग और मनोवैज्ञानिक सहायता मिलनी चाहिए।
अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे दुर्व्यवहार या शोषण के शिकार लोगों (चाहे वह ऑनलाइन हुआ हो या किसी अन्य तरीके से) के लिए सहायता तंत्र (Support Mechanisms) बनाएं।
अदालत ने कहा कि इन तंत्रों के ज़रिए पीड़ितों को प्रशिक्षित पेशेवरों से काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता और थेरेपी मुफ्त में और ज़रूरत के अनुसार लंबे समय तक मिलनी चाहिए। साथ ही सरकारों को ऐसे फॉलो-अप तंत्र भी बनाने चाहिए, जिससे पीड़ितों की भलाई और स्थिति पर लगातार नज़र रखी जा सके।
अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सुनवाई की अगली तारीख, 10 दिसंबर 2026 तक एक हलफनामा (Affidavit) दाखिल करे। इसमें यह बताया जाए कि आदेश में चर्चा किए गए उपायों और सुरक्षा इंतजामों को लागू करने में अब तक क्या प्रगति हुई।
Case Title : Case Title – Just Rights for Children Alliance & Anr. v. S. Harish & Ors.