रविवार को एक विशेष सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा तय प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जाएगा। यह निर्देश खासकर उन शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों के जमावड़े के संबंध में है, जो उन इलाकों से बाहर हैं जहाँ निषेधाज्ञा (Prohibitory Orders) लागू है।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे सुप्रीम कोर्ट के आसपास के इलाके में BNSS की धारा 163 लागू करने से संबंधित बोर्ड को हटा दें (यदि पहले से नहीं हटाया गया)। ऐसा इसलिए ताकि न्याय तक पहुँचने—जिसमें किसी भी अदालत में आने-जाने की सुविधा भी शामिल है—को लेकर कोई आशंका न रहे।

कोर्ट ने आगे निर्देश दिया कि मेट्रो और रेल सेवाएँ सामान्य रूप से चलनी चाहिए, सिवाय तब जब संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था में गड़बड़ी को देखते हुए प्रतिबंध लगाना ज़रूरी हो।

लोगों की आवाजाही के बारे में कोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रैफिक नियमों के अधीन शहर में लोगों की स्वतंत्र आवाजाही की अनुमति दी जाए। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि कानून-व्यवस्था और ट्रैफिक की अन्य स्थितियों को ध्यान में रखते हुए बैरिकेड्स लगाने के फैसले की तुरंत समीक्षा की जाए।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि इंटरनेट सेवाएं बिना किसी रुकावट के जारी रहनी चाहिए।

कोर्ट ने SGI तुषार मेहता के इस आश्वासन पर ध्यान दिया कि मेट्रो रेलवे पूरी तरह से काम कर रही है, कल (शनिवार) रात 10 बजे से सभी स्टेशन खुले हैं, ट्रेनें सामान्य रूप से चल रही हैं और इंटरनेट कनेक्शन भी बहाल कर दिया गया।

कोर्ट ने शुक्रवार को पारित उस आदेश का भी ज़िक्र किया, जिसमें संबंधित अधिकारियों को दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों को बंद करने के पिछले नोटिफिकेशन पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया। यह निर्देश इस बात को ध्यान में रखते हुए दिया गया कि मेट्रो और रेल सेवाओं के संचालन को नियंत्रित तो किया जा सकता है, लेकिन उचित मामलों में उन्हें पूरी तरह से रोका नहीं जाना चाहिए।

उस आदेश में अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया कि वे पुनर्विचार के बाद लिए गए फैसले को सार्वजनिक करें ताकि आगे कोई असुविधा न हो।

पक्षों की दलीलें सुनने और अवमानना ​​याचिका (Contempt Petition) में कही गई बातों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने कथित अवमानना ​​करने वालों को नोटिस जारी किया। उन्हें अवमानना ​​याचिका के जवाब में हलफनामा दाखिल करने और ऊपर बताए गए आदेश के अनुसार अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) जमा करने का निर्देश दिया गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि रविवार ज़िक्र की गई अन्य सूचीबद्ध न की गई याचिकाओं को अवमानना ​​की कार्यवाही के साथ जोड़ दिया जाएगा। सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि पुलिस ट्रेनों से और जंतर-मंतर के 4 किलोमीटर के दायरे के बाहर मौजूद लोगों को उठा रही थी।

उन्होंने यह भी कहा कि इलाके में इंटरनेट बंद है और कोर्ट के आदेश के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए।

सीनियर एडवोकेट शादान फरासत ने कोर्ट को बताया कि कल (शनिवार) विरोध प्रदर्शन के दौरान उनके साथ भी बेरहमी से मारपीट की गई।

उन्होंने कहा,

"सवाल सिर्फ़ वकीलों का नहीं है। वकील होने के नाते हमारे पास कोई खास अधिकार नहीं हैं। कल शहर में हालात बहुत दमनकारी थे। लोगों को वहां खड़े भी नहीं होने दिया जा रहा था। मुझे उठाकर एक चलती हुई बस में फेंक दिया गया। यह नागरिकों के विरोध करने के अधिकार का मामला है। मुझे जो महसूस हुआ - कल हम 'पुलिस स्टेट' बनने से बस एक कदम दूर थे। कृपया राजधानी में नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को बहाल करें। कल उस अधिकार को खत्म कर दिया गया।"

सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन ने कहा कि हालात ऐसे हैं कि प्रैक्टिस करने वाले वकील शहर में घूम नहीं सकते और तस्वीरें खुद सब कुछ बयां कर रही हैं।

सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कई वीडियो का ज़िक्र किया और कहा कि जब वह बोल रहे थे, तब भी सुप्रीम कोर्ट के बाहर BNSS की धारा 163 लागू कर दी गई।

उन्होंने कहा,

"इसकी खबर LiveLaw में भी आई है। यह चौंकाने वाला है। जिस तरह की हिंसा हो रही है - यह आनुपातिकता (Proportionate) का सवाल भी नहीं है। सबसे पहले ज़रूरत देखी जानी चाहिए। निहत्थे बच्चों को पीटना, लात मारना... उनके साथ बिना वजह हाथापाई करना। हमें कई वीडियो मिल रहे हैं - ये लोग इसे बहादुरी के बैज की तरह दिखाते हैं। इस घटना ने हमारे मन में कई भावनाएं जगा दी हैं। यह हमारे दरवाज़े तक आ गई।"

उन्होंने मांग की कि लोगों की आवाजाही पूरी तरह से बहाल की जाए, सभी बैरिकेड हटाए जाएं और मेट्रो स्टेशनों को फिर से खोलने का निर्देश दिया जाए।

उन्होंने कहा,

"उन्हें लगता है कि 47 (मेट्रो स्टेशन) ठीक हैं। उन्होंने ट्रेनों में कोई बदलाव नहीं किया। इस बारे में लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। बिना बैज वाले पुलिसकर्मियों को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी। मैंने पहले भी यह बात उठाई थी - यह मामला कमेटी के पास गया। हमें उम्मीद है कि माननीय अदालत इस पर निर्देश देगी। जो लोग जिम्मेदार हैं, उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए!"

सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने कोर्ट को बताया कि न्याय तक पहुंच का मतलब वकीलों तक पहुंच भी है और अगर वकीलों को अपना काम करने से रोका जाता है तो इससे सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट की गरिमा प्रभावित होती है।

हेगड़े ने कहा,

"SG (सॉलिसिटर जनरल) बार के नेता हैं। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर वकील अपने क्लाइंट से मिल सके और पुलिस स्टेशनों में उन्हें मदद दे सके। कल पुलिस स्टेशनों में वकीलों की पिटाई की गई। पुलिसकर्मियों ने वकीलों को FIR की धमकी दी।"

एक महिला वकील ने कोर्ट को बताया कि वह 150 अन्य वकीलों के साथ शांतिपूर्वक चल रही थीं, तभी उनमें से चार को पकड़कर जेल वैन में ले जाया गया। उन्होंने कहा कि एक महिला ने उन्हें धक्का दिया और उनके साथ बदसलूकी की, उन्हें एक पल भी रुकने नहीं दिया।

उन्होंने कहा,

"कोई नेम बैज नहीं था। अगर हिंसा हुई होती तो कार्रवाई की जा सकती थी। लेकिन हम शांतिपूर्ण थे।"

सीनियर एडवोकेट शोएब आलम ने कहा कि इस मामले में चिंता नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़ी है और भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 लोगों के पक्ष में है।

इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि CJI ने स्पष्ट कर दिया कि अनुच्छेद 19(2) कोई रोक नहीं है, बल्कि एक नियमन (रेगुलेशन) है।

एडवोकेट जय अनंत देहाद्रई पेश हुए और कहा कि वह उन कुछ पुलिस अधिकारियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जिनके साथ विरोध प्रदर्शन के दौरान बर्बरता की गई।

इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की:

"पुलिस अधिकारियों को राज्य से ऊपर कानून-व्यवस्था बनाए रखने का कोई व्यक्तिगत अधिकार नहीं है। कृपया SG की सहायता करें। जीवन और स्वतंत्रता समान रूप से संवेदनशील हैं - हमने यह पहले भी कहा है। चाहे वह पुलिस अधिकारी हो या नागरिक। सभी इंटरवेंशन एप्लीकेशन (हस्तक्षेप याचिकाएं) लिस्ट की जाएंगी। हम लिस्ट किए गए मामलों पर एक संयुक्त आदेश पारित करेंगे।"

अंतरिम आदेश की मांग करते हुए खुद याचिकाकर्ता के तौर पर पेश हुईं सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि मेट्रो सेवा रोककर पुलिस नागरिकों के आने-जाने की आज़ादी नहीं छीन सकती। उन्होंने कहा कि 7000 लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर है और सरकार किसी को भी आधिकारिक आंकड़े नहीं दे रही है।

उन्होंने कहा,

"पूरी दिल्ली में 45 डिटेंशन सेंटर बनाए जाने की खबर है। विपक्ष के नेताओं को हिरासत में लिया गया। सांसदों को उनके घरों में ही रोक दिया गया। यह सही नहीं है। युवाओं ने कानूनी तरीके से विरोध करने का फैसला किया, क्योंकि उन्हें लगता है कि चुनाव प्रणाली निष्पक्ष नहीं है। हमने अंतरिम राहत की मांग की है। संविधान के अनुच्छेद 358 में कहा गया कि आपातकाल लागू होने पर अनुच्छेद 19 के तहत मिले अधिकारों पर रोक लगाई जा सकती है। क्या सरकार यह कह रही है कि अघोषित आपातकाल लगा हुआ है? 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) एक अहम कानूनी उपाय है। जब हमने याचिका दायर की थी, तब हमें हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या का अंदाज़ा नहीं था, क्योंकि इंटरनेट बंद कर दिया गया।"

उन्होंने आगे कहा,

"आप लोग आज यहां इसलिए जमा हुए हैं, क्योंकि कोई बहुत गंभीर बात दांव पर लगी है। नागरिकों के शांतिपूर्ण तरीके से अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने पर रोक लगाई गई। पिछली बार इस अदालत को ऐसे मामलों पर आपातकाल के समय विचार करना पड़ा था। हम 50 साल बाद फिर उसी स्थिति में हैं - आपके पूर्ववर्तियों ने ADM जबलपुर मामले में फैसला सुनाया था!"

उन्होंने कहा कि अंतरिम आदेश के तहत उन लोगों को नोटिस जारी किया जाए जिन पर अदालत की अवमानना ​​का आरोप है, ताकि वे जवाब दे सकें और अदालत के सामने पेश हो सकें। इसमें गृह सचिव और मेट्रो के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं। साथ ही, सभी रोक वाले आदेश तुरंत वापस लिए जाएं।

SGI तुषार मेहता ने कहा कि 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका अब शायद काम की न रहे, क्योंकि जिन लोगों को हिरासत में लिया गया, उन्हें रिहा कर दिया गया। अवमानना ​​याचिका के बारे में उन्होंने कहा कि 10 अक्टूबर को मेट्रो सेवा में कोई कटौती नहीं की गई और मेट्रो के कुल कामकाज में कोई कमी नहीं आई।

उन्होंने कहा,

"ट्रेनें तय शेड्यूल के हिसाब से चलाई गईं। 10 अक्टूबर को इंटरनेट पर दिए गए शेड्यूल के मुताबिक कुल 4750 ट्रेनें चलाई गईं। दिल्ली मेट्रो में 303 स्टेशन हैं, जिनमें से 47 बंद या सीमित किए गए।"

इस पर जस्टिस बागची ने कहा:

"क्या ये सलाह रेलवे अधिकारियों की तरफ से हैं? कृपया इन याचिकाओं पर अपना जवाब और अनुपालन रिपोर्ट मंगलवार तक दाखिल करें। इस बीच, मेट्रो का कामकाज सामान्य शेड्यूल के अनुसार जारी रहना चाहिए (यह आर्टिकल 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था की शर्त के अधीन है)। किसी भी वकील को उनके पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन में किसी भी तरह से रोका नहीं जाना चाहिए। हम जानबूझकर 'पेशेवर' शब्द कह रहे हैं। शहर में इंटरनेट सुविधा बहाल की जानी चाहिए।"

अदालत ने कहा कि हालांकि वह एक अंतरिम आदेश पारित करेगी, लेकिन वह इस मुद्दे पर भी सुनना चाहेगी कि पुलिस का काम करने का तरीका आर्टिकल 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आवश्यकताओं के साथ किस हद तक मेल खाता है।

सिब्बल ने जवाब दिया कि देश का कोई भी पुलिस एक्ट या कानून सार्वजनिक व्यवस्था को छोड़कर आर्टिकल 19(2) का उल्लंघन नहीं कर सकता।

उन्होंने कहा,

"मेरा आर्टिकल 19(1)(a) के तहत अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है। इंटरनेट - फिर से अंतरिम आदेश की आवश्यकता है कि इसे पूरे शहर में बहाल किया जाए। आखिरी बात पत्रकारों के बारे में है - उन्हें अंदर और बाहर दोनों जगह बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।"

अदालत ने रविवार, 11 अक्टूबर को एक विशेष सुनवाई की। यह सुनवाई 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों को दिल्ली पुलिस द्वारा संभालने के तरीके से जुड़ी याचिकाओं पर की गई। इन मामलों में एक अवमानना ​​याचिका शामिल है, जिसमें आरोप लगाया गया कि अधिकारियों ने कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश का उल्लंघन करते हुए दिल्ली मेट्रो सेवाओं पर रोक जारी रखी। इसके अलावा, सीनियर एडवोकेट और तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी द्वारा दायर एक 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका भी शामिल है, जिसमें कई राजनीतिक नेताओं की हिरासत को चुनौती दी गई।

ये कार्यवाही बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में लेने, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस के अत्यधिक बल प्रयोग, सार्वजनिक परिवहन और मोबाइल इंटरनेट सेवाओं पर रोक और प्रदर्शनों के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों व पत्रकारों के साथ किए गए व्यवहार के आरोपों से जुड़ी है।

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: