BREAKING| IPC की धारा 498A 'शादी जैसे रिश्तों' पर भी होगी लागू: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-08-03 09:34 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (3 अगस्त) को कहा कि 'शादी जैसे रिश्तों' (Live in Relationship) में रहने वाली महिलाओं को IPC की धारा 498A के तहत सुरक्षा से बाहर रखना भेदभावपूर्ण होगा। कोर्ट ने माना कि ऐसे रिश्ते में रहने वाले पुरुष पर भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की धारा 498A के तहत घरेलू क्रूरता का मुकदमा चलाया जा सकता है।

हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि यह फ़ैसला उन "लिव-इन रिश्तों" पर लागू होगा जो "शादी जैसे रिश्तों" की श्रेणी में आते हैं, यानी जहाँ शादी करने का इरादा साफ़ हो।

कोर्ट ने कहा कि क्रूरता से सुरक्षा के मामले में कानूनी रूप से विवाहित महिला और शादी जैसे रिश्ते में रहने वाली महिला के बीच फ़र्क करना असंवैधानिक है और यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा,

"जब धारा 498A का मकसद उन मामलों को सुरक्षा देना था, जहां पति या ससुराल वाले जानबूझकर ऐसा व्यवहार करते हैं, जिससे महिला को मानसिक या शारीरिक चोट पहुंचती है या वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाती है तो यह कहना कि ऐसा उत्पीड़न केवल शादी के बाद ही हो सकता है और उससे पहले नहीं—हमारी राय में—मामले को बहुत सरलता से देखना होगा... 'विवाहित' और 'शादी जैसे लिव-इन रिश्ते' के बीच यह फ़र्क—जहां तक धारा 498A के तहत सुरक्षा का सवाल है—घरेलू हिंसा को रोकने के मकसद से कोई तार्किक संबंध नहीं रखता और इस तरह यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।"

बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फ़ैसला सही ठहराते हुए यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता-पति के ख़िलाफ़ क्रूरता के मामले की कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया था। पति ने यह तर्क देते हुए IPC की धारा 498A के तहत मुक़दमे से छूट मांगी थी कि यह प्रावधान लिव-इन रिश्तों पर लागू नहीं होता है।

याचिकाकर्ता-पति के ख़िलाफ़ मुक़दमा जारी रखने का समर्थन करते हुए कोर्ट ने IPC की धारा 498A के तहत "पति" शब्द की व्यापक व्याख्या की और माना कि इसमें शादी जैसे रिश्ते में रहने वाला पुरुष भी शामिल है। इसका मतलब है कि यह प्रावधान उन लिव-इन रिलेशनशिप पर लागू होता है, जिन्हें "शादी जैसे रिश्ते" माना जाता है, और जिनमें शादी करने का इरादा उस रिश्ते का एक अहम हिस्सा होता है।

कोर्ट ने कहा,

"धारा 498A उन 'लिव-इन रिलेशनशिप' पर लागू होती है, जिन्हें 'शादी जैसे रिश्ते' माना जाता है और जिनमें शादी करने का इरादा उस रिश्ते का एक अहम हिस्सा होता है।"

याचिकाकर्ता पर शिकायतकर्ता के साथ क्रूरता करने का आरोप था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि उनके बीच कोई वैध शादी नहीं हुई, इसलिए IPC की धारा 498A लागू नहीं की जा सकती। शिकायतकर्ता का दावा था कि वे एक वैध और कायम शादी के रिश्ते में थे।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कार्यवाही रद्द करने की अपीलकर्ता की याचिका खारिज की। कोर्ट ने कहा कि धारा 498A में "पति" शब्द का अर्थ व्यापक और उद्देश्यपूर्ण तरीके से समझा जाना चाहिए; इसे केवल इस तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि शादी अमान्य (void) थी।

हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर पति ने सुप्रीम कोर्ट में SLP (विशेष अनुमति याचिका) दायर की।

विवादित निष्कर्षों में दखल देने से इनकार करते हुए जस्टिस करोल के फैसले में कहा गया कि धारा 498A का मकसद घरेलू रिश्तों में महिलाओं के साथ होने वाली क्रूरता और उत्पीड़न से निपटना है—जिसमें शारीरिक या मानसिक चोट पहुंचाना या महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करना शामिल है। इसलिए क्रूरता इसलिए कम हानिकारक नहीं हो जाती कि पक्षकारों ने औपचारिक रूप से शादी नहीं की।

पार्टनर चुनने के अधिकार का इस्तेमाल करने का मतलब सुरक्षा का अधिकार खोना नहीं

K.S. Puttaswamy बनाम Union of India, (2017)10 SCC 1 और Shafin Jahan बनाम Asokan K.M., (2018) 16 SCC 368 के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जब कानून लोगों को अपने रिश्ते चुनने की आज़ादी देता है तो वह उन्हें कानूनी सुरक्षा देने से इनकार नहीं कर सकता, चाहे उस रिश्ते का स्वरूप कुछ भी हो।

कोर्ट ने सवाल किया,

"अगर किसी महिला को अपने पति/पार्टनर या उसके परिवार के सदस्यों से क्रूरता का सामना करना पड़ता है तो उसे दी जाने वाली सुरक्षा में कोई अंतर क्यों होना चाहिए?"

कोर्ट ने शादीशुदा महिला और 'शादी जैसे' लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला के बीच इस प्रावधान के लागू होने में भेदभाव को उजागर किया।

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जो महिला अपने पार्टनर के साथ शादी जैसे लिव-इन रिलेशनशिप में रहती है, उसे सिर्फ़ इसलिए क्रूरता के खिलाफ़ सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उस रिश्ते को शादी की औपचारिक कानूनी मान्यता नहीं मिली।

निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले गए:

"(i) धारा 498A उन “लिव-इन रिलेशनशिप” पर लागू होती है, जो “शादी जैसे रिश्ते” की श्रेणी में आते हैं और जिनमें शादी करने का इरादा उस रिश्ते का एक अहम हिस्सा होता है।

(ii) धारा 498A के तहत सुरक्षित “लिव-इन रिलेशनशिप” वे हैं, जो दो बालिग़ लोगों की आपसी सहमति से बने हों।

(iii) कानून का यह सिद्धांत केवल IPC की धारा 498A तक ही सीमित रहेगा और इसकी यह विस्तृत व्याख्या किसी अन्य प्रावधान को प्रभावित नहीं करेगी।

(iv) Arnesh Kumar मामले में गिरफ्तारी और अन्य कारकों के संबंध में तय किए गए सुरक्षा उपायों को सख्ती से लागू किया जाएगा। शादी जैसे रिश्ते में रहने वाले किसी भी व्यक्ति (चाहे वह “शादी जैसा” लिव-इन पार्टनर हो या उसका रिश्तेदार) को, जिस पर महिला के खिलाफ क्रूरता करने का आरोप हो, प्रारंभिक जांच के बिना गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।"

उपरोक्त के आधार पर याचिका का निपटारा इस टिप्पणी के साथ किया गया,

"इस मामले के तथ्यों से संबंधित यहां की गई चर्चा केवल केस रद्द करने से इनकार के खिलाफ अपीलों के फैसले तक ही सीमित है और यह मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं है।"

Cause Title: X & ORS. VERSUS STATE OF KARNATAKA & ANR.

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