सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि मुक्त कराए गए बंधुआ मजदूरों को पुनर्वास योजना के तहत तत्काल वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए। यह सहायता आमतौर पर रिहाई प्रमाण-पत्र जारी होने के सात दिनों के भीतर दी जानी चाहिए। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि पुनर्वास में देरी का मतलब असल में पुनर्वास से वंचित करना ही है।

कोर्ट ने कहा,

"समय पर पुनर्वास का बहुत महत्व है। बंधुआ मजदूरी से मुक्त होने के बाद अक्सर व्यक्ति के पास आजीविका का कोई स्वतंत्र साधन नहीं होता और वह आगे भी शोषण का शिकार हो सकता है। तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए दी जाने वाली वित्तीय सहायता का उद्देश्य तब खत्म हो जाता है, जब इसे देने में महीनों या सालों की देरी हो जाती है।"

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि बंधुआ मजदूरों के प्रति संवैधानिक जिम्मेदारी उनकी रिहाई के साथ ही खत्म नहीं हो जाती।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की बेंच ने 'बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976' और 'बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास के लिए केंद्रीय क्षेत्र की योजना' को पूरे देश में एक समान तरीके से लागू करने के लिए कई निर्देश जारी किए।

कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि 14 मई, 2026 की संशोधित 'मानक संचालन प्रक्रिया' (SOP) को पूरे देश में एक समान रूप से लागू किया जाए। साथ ही सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा गया कि वे छह महीने के भीतर इन निर्देशों का पालन करें।

कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के साथ परामर्श करके तीन महीने के भीतर अतिरिक्त दिशा-निर्देश जारी करे।

कोर्ट ने यह फैसला दो रिट याचिकाओं पर सुनाया, जो पूरे देश में बंधुआ मजदूरों की पहचान, उन्हें मुक्त कराने, रिहाई और पुनर्वास से जुड़ी थीं।

पहली याचिका 28 फरवरी, 2019 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में एक ईंट भट्ठे से याचिकाकर्ता सुरेंद्र मांझी और कई अन्य बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराए जाने से जुड़ी थी।

आरोप है कि इन मजदूरों को बिहार के उनके गृह जिलों से उत्तर प्रदेश लाया गया। उनसे कहा गया कि वे अपना कर्ज चुकाने के लिए काम करें, लेकिन वहां उनसे बहुत ही खराब और शोषणकारी स्थितियों में काम कराया गया। मुक्त कराए जाने के बाद, उन्हें वापस बिहार भेज दिया गया और रिहाई प्रमाण-पत्र दिए गए।

हालांकि, कई मजदूरों को पुनर्वास योजना के तहत मिलने वाली तत्काल वित्तीय सहायता नहीं मिली। खुद मांझी को यह सहायता उनके बचाव के लगभग तीन साल बाद 2022 में मिली। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि जिन 42 मजदूरों को रिहाई प्रमाण-पत्र जारी किए गए, उनमें से केवल 25 को ही 20,000 रुपये की तत्काल आर्थिक सहायता मिली है, जबकि बाकी 17 मजदूरों को अभी भी भुगतान का इंतजार है।

अदालत ने उत्तर प्रदेश और बिहार को निर्देश दिया कि वे मिलकर एक महीने के भीतर उन 17 मजदूरों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता की स्थिति की जांच करें। अदालत ने कहा कि अगर कोई आर्थिक सहायता अभी भी दी जानी बाकी है तो उसका भुगतान जल्द से जल्द किया जाना चाहिए - कोशिश रहे कि यह तीन महीने के भीतर हो जाए, और हर हाल में छह महीने के भीतर तो हो ही जाना चाहिए।

अदालत ने निर्देश दिया कि बंधुआ मजदूरी से जुड़ी शिकायतों की जांच आमतौर पर 24 घंटे के भीतर हो जानी चाहिए, और जहां जरूरी हो, वहां तुरंत बचाव अभियान चलाया जाना चाहिए।

बंधुआ मजदूरी की पहचान होने पर संबंधित अधिकारी को बिना किसी देरी के जरूरी जांच करनी चाहिए और आमतौर पर यह तय होने के 24 घंटे के भीतर रिहाई प्रमाण-पत्र जारी कर देना चाहिए।

अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह रिहाई प्रमाण-पत्रों के लिए एक समान प्रारूप (फॉर्मेट) तय करे, जिसे सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मान्यता मिले, ताकि प्रशासनिक जरूरतों में अंतर के कारण पुनर्वास के काम में कोई रुकावट न आए।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि बचाए गए मजदूरों के बयान उचित सुरक्षा उपायों के साथ दर्ज किए जाएं, और उन्हें रिहाई प्रमाण-पत्र तथा पुनर्वास के अधिकारों से जुड़ी जानकारी ऐसी भाषा में उपलब्ध कराई जाए जिसे वे समझ सकें।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों से जुड़े मामलों में विशेष संवेदनशीलता बरतने की जरूरत है।

अदालत ने इस मामले को 7 महीने बाद के लिए सूचीबद्ध किया, ताकि निर्देशों के पालन की निगरानी की जा सके और आगे के निर्देश दिए जा सकें।

Case Title : Surendra Manjhi & Anr. v. Union of India & Ors.

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