BNSS S.223(1) का परंतुक अनिवार्य, आरोपी को सुने बिना संज्ञान लेना शुरू से ही अमान्य: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-21 09:45 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 223(1) का पहला परंतुक—जो किसी शिकायत मामले में संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य बनाता है—अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से उत्पन्न होने वाला एक मूल सुरक्षा उपाय है। इसका पालन न करने पर संज्ञान लेने का आदेश शुरू से ही अमान्य हो जाएगा।

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि आरोपी को ऐसे पालन न होने से हुए नुकसान को साबित करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह दोष एक ऐसी अवैधता है जो पूरी कार्यवाही को ही दूषित कर देती है, न कि केवल एक प्रक्रियात्मक अनियमितता।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने यह फैसला PMLA मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) के खिलाफ परविंदर सिंह द्वारा दायर अपील स्वीकार करते हुए सुनाया। खंडपीठ ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले के साथ-साथ स्पेशल कोर्ट के उस आदेश को भी रद्द किया, जिसमें ED की अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लिया गया।

यह मामला जुलाई 2023 में अपीलकर्ता के खिलाफ दर्ज की गई एक प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR) से जुड़ा है। ED ने 24 जून, 2024 को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 44 और 45 के तहत अपनी अभियोजन शिकायत दायर की थी। हालांकि शिकायत BNSS के 1 जुलाई, 2024 से लागू होने से पहले दायर की गई, लेकिन स्पेशल कोर्ट ने 2 जुलाई, 2024 को आरोपी को सुने बिना ही इस पर संज्ञान ले लिया।

अपीलकर्ता ने संज्ञान लेने के इस आदेश को चुनौती देते हुए यह तर्क दिया कि BNSS की धारा 223(1) का पहला परंतुक स्पेशल कोर्ट के लिए यह अनिवार्य बनाता है कि वह संज्ञान लेने से पहले आरोपी की बात सुने। ED ने इस याचिका का विरोध करते हुए यह दलील दी कि PMLA अपने आप में एक स्वतंत्र कानून है; चूंकि शिकायत BNSS के लागू होने से पहले दायर की गई, इसलिए इस मामले की कार्यवाही पुराने CrPC के तहत संचालित होगी; और वैसे भी, आरोपी ने सुनवाई न होने से उसे किसी भी तरह का नुकसान होने की बात साबित नहीं की है।

इन दलीलों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि CrPC के तहत शिकायत मामलों को नियंत्रित करने वाले प्रक्रियात्मक प्रावधान—जो अब BNSS की धारा 223 से 228 में शामिल हैं—PMLA शिकायतों पर भी लागू होते हैं, क्योंकि उन प्रावधानों और PMLA ढांचे के बीच कोई असंगति नहीं है।

कोर्ट ने अपने पिछले फैसलों तरसेम लाल बनाम ED, यश टुटेजा बनाम भारत संघ और कौशल कुमार अग्रवाल बनाम ED का हवाला देते हुए यह दोहराया कि एक बार PMLA की धारा 44(1)(b) के तहत शिकायत दर्ज हो जाने के बाद सामान्य आपराधिक कानून के तहत शिकायत प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले प्रावधान विशेष न्यायालय के समक्ष होने वाली कार्यवाही पर लागू होते हैं।

धारा 223 आरोपी को एक अधिकार देती है; इसका उल्लंघन कार्यवाही को दूषित कर देता है।

परंतुक (Proviso) की प्रकृति पर खंडपीठ ने फैसला दिया कि संज्ञान लेने से पहले सुने जाने का अधिकार केवल प्रक्रियात्मक नहीं है।

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि परंतुक में "shall" (अनिवार्य रूप से) शब्द का प्रयोग अनुपालन को अनिवार्य बनाता है। यह भी जोड़ा कि इस आवश्यकता का पालन किए बिना लिया गया कोई भी संज्ञान शुरू से ही अमान्य होगा।

हालांकि, BNSS का अध्याय XVI मजिस्ट्रेट को की गई शिकायतों से संबंधित प्रक्रियात्मक कानून निर्धारित करता है, हम यह मानते हैं कि उपर्युक्त परंतुक प्रकृति में मूल (Substantive) है; क्योंकि यह केवल कार्यवाही के संचालन के तरीके को ही विनियमित नहीं करता, बल्कि यह आरोपी को संज्ञान लेने से पहले सुने जाने का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार, भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी को प्राप्त निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का एक हिस्सा है। हम आगे यह भी मानते हैं कि उक्त परंतुक में प्रयुक्त शब्द "shall" की व्याख्या अनिवार्य प्रकृति के रूप में की जानी चाहिए, जिसका लाभ अंततः आरोपी को ही मिलता है। परिणामस्वरूप, उपर्युक्त परंतुक का उचित अनुपालन किए बिना किसी न्यायालय द्वारा किसी अपराध का लिया गया संज्ञान शुरू से ही (ab initio) अमान्य होगा।

ED की इस दलील पर कि आरोपी को यह साबित करना होगा कि उसे कोई नुकसान हुआ, बेंच ने इस तर्क को पूरी तरह से खारिज किया।

ED के इस तर्क को खारिज किया कि BSS की धारा 223 से पहले की शिकायतों पर पिछली तारीख से (Retroactively) लागू नहीं हो सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 531(2)(a) के तहत BNSS के 'सेविंग्स क्लॉज़' (बचाव प्रावधान) के दायरे को भी स्पष्ट किया। कोर्ट ने ED की इस दलील को खारिज कर दिया कि पुराना CrPC ही इस मामले पर लागू रहेगा, सिर्फ इसलिए कि अभियोजन की शिकायत BNSS के लागू होने से पहले दायर की गई।

कोर्ट ने कहा कि धारा 531(2)(a) का मकसद CrPC और BNSS के बीच टुकड़ों में होने वाले बदलावों को रोकना है। यह सुनिश्चित करता है कि पुराने कानून के तहत पहले से शुरू हुई कानूनी कार्यवाही, जब तक पूरी न हो जाए, उसी ढांचे के तहत चलती रहे। हालांकि, जहां 'सेविंग्स क्लॉज़' के तहत सोची गई कोई भी कार्यवाही—जैसे अपील, जांच, छानबीन या मुकदमा अभी तक शुरू नहीं हुई, वहां आरोपी BNSS द्वारा दिए गए मूल अधिकारों का हकदार होगा।

कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा,

"BNSS के तहत दिया गया कोई भी मूल अधिकार निश्चित रूप से उस आरोपी के फायदे में होगा, जिसके खिलाफ BNSS की धारा 531(2)(a) के तहत सोची गई कोई भी कार्यवाही अभी तक शुरू नहीं हुई।"

कोर्ट ने आगे कहा कि यह नए कानून को पिछली तारीख से लागू करने का मामला नहीं है, बल्कि BNSS द्वारा दिए गए एक "बेहतर अधिकार" को आगे की तारीख से लागू करने का मामला है।

बेंच ने फैसला दिया कि ED की शिकायत को सिर्फ नंबर देना और 1 जुलाई, 2024 से पहले उसे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करना, "जांच" की शुरुआत नहीं माना जा सकता, क्योंकि उस चरण पर किसी भी तरह की न्यायिक सोच-विचार (judicial application of mind) नहीं हुई। चूंकि संज्ञान (Cognizance) BNSS के लागू होने के बाद ही लिया गया, इसलिए आरोपी धारा 223(1) के तहत सुनवाई के सुरक्षा-अधिकार का हकदार था।

यह देखते हुए कि अपीलकर्ता के खिलाफ आरोप गंभीर थे, कोर्ट ने फैसला दिया कि कानूनी सुरक्षा-अधिकार को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

तदनुसार, कोर्ट ने विशेष अदालत के 2 जुलाई, 2024 के संज्ञान लेने का आदेश रद्द किया। कोर्ट ने विशेष अदालत को निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ता को सुनवाई का मौका देने के बाद संज्ञान लेने के चरण से ही मामले की कार्यवाही नए सिरे से शुरू करे। यह पूरी प्रक्रिया आठ हफ़्तों के भीतर पूरी की जानी है।

Cause Title: PARVINDER SINGH VERSUS DIRECTORATE OF ENFORCEMENT

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