Art. 226 | हाईकोर्ट 'सर्टिओरारी' अधिकार क्षेत्र के तहत सबूतों का दोबारा मूल्यांकन या तथ्यों से जुड़े निष्कर्षों में दखल नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-07-18 05:09 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट 'सर्टिओरारी' की रिट जारी करके उन सबूतों की समीक्षा या दोबारा जांच नहीं कर सकता, जिनके आधार पर निचली अदालतों ने किसी मामले में फैसला सुनाया था। कोर्ट ने दोहराया कि ऐसा अधिकार क्षेत्र केवल अदालतों या ट्रिब्यूनल द्वारा अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गलतियों को सुधारने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, न कि सबूतों का दोबारा मूल्यांकन करने या अपील की अदालत की तरह काम करने के लिए।

ऐसा कहते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जो उसने अपने रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए सुनाया था। इस फैसले में हाईकोर्ट ने पहली अपीलीय अदालत (First Appellate Court) के उन निष्कर्षों को खारिज किया, जो रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों पर उचित विचार करने के बाद निकाले गए।

कोर्ट ने कहा,

"...एक बार जब पहली अपीलीय अदालत, जो अपील पर फैसला करने के लिए पूरी तरह सक्षम थी, ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों पर उचित विचार करने के बाद निष्कर्ष निकाल लिए थे, तो यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसे निष्कर्ष अधिकार क्षेत्र के बिना या अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर दिए गए। इसलिए हमारी राय में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए हाईकोर्ट पैरा 24 में दिए गए निष्कर्षों को रद्द नहीं कर सकता।"

संपत्ति के बंटवारे के एक मुकदमे को ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वादी अपने अधिकार साबित करने में विफल रहे। पहली अपीलीय अदालत ने इस खारिज करने के फैसले को तो बरकरार रखा, लेकिन पैरा 24 में बिक्री विलेखों (sale deeds) की असलियत पर ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को पलट दिया।

पहली अपीलीय अदालत के फैसले से असंतुष्ट एक खरीदार ने सिर्फ पैरा 24 को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की।

हाईकोर्ट ने प्रतिवादी नंबर 1 और नंबर 6 को नोटिस जारी किए बिना - जिनके अधिकारों पर असर पड़ रहा था - इन निष्कर्षों को "दलीलों (Pleadings) द्वारा समर्थित नहीं" बताते हुए रद्द किया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई।

अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि हाईकोर्ट ने सबूतों का दोबारा मूल्यांकन करके 'सर्टिओरारी' अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया और प्रभावित पक्षों की बात सुने बिना फैसला सुनाकर प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का उल्लंघन किया। इसके साथ ही कोर्ट ने पहली अपीलीय अदालत का फैसला बहाल किया।

कोर्ट ने कहा,

“यह एक स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि इस तरह के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए हाईकोर्ट निचली अदालतों या ट्रिब्यूनल के फैसलों - खासकर तथ्यों से जुड़े फैसलों - के लिए अपील की अदालत के तौर पर काम नहीं करता है। हाईकोर्ट उन सबूतों की दोबारा समीक्षा या जांच नहीं करता, जिनके आधार पर निचली अदालतों ने अपना फैसला सुनाया हो। इस तरह के रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल तब किया जा सकता है, जब कानून की कोई गलती हो, अधिकार क्षेत्र से जुड़ी कोई गलती हो, या कोई साफ-साफ गैर-कानूनी बात हो।”

कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपने रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए पहली अपीलीय अदालत के फैसलों में दखल देकर गलती की, जबकि हाईकोर्ट के सामने आए उन फैसलों तक रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों पर ठीक से विचार करने के बाद ही पहुंचा गया।

कोर्ट ने कहा,

“पैराग्राफ 24 में की गई टिप्पणियां रिकॉर्ड पर रखे गए सबूतों को नजरअंदाज करके या उनके बिना नहीं की गईं, बल्कि मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों द्वारा पेश किए गए सबूतों पर विचार करने के बाद की गईं।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने पहली अपीलीय अदालत के उन फैसलों में दखल देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया, जो दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों पर ठीक से विचार करने के बाद दिए गए।

ऊपर बताई गई बातों के आधार पर अपील मंजूर की गई। पहली अपीलीय अदालत का फैसला बहाल किया गया।

Cause Title: BASAMMA & ANR. Versus GOPARAPPA AND ORS.

Tags:    

Similar News