सिर्फ़ इसलिए कि कोई प्रशासनिक कार्रवाई औपचारिक आदेश के तौर पर जारी नहीं की गई, उसे रद्द नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (30 जुलाई) को कहा कि जब किसी अथॉरिटी के पास संबंधित कानून के तहत कार्रवाई करने की शक्ति होती है तो सिर्फ़ इस बात से कि कार्रवाई को औपचारिक "आदेश" के बजाय "सर्कुलर" या "कम्युनिकेशन" कहा गया है, वह अमान्य नहीं हो जाती।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा,
"एक बार जब शक्ति मौजूद होती है और यह स्पष्ट होता है कि इस विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया गया है तो जिस तरीके से इसका इस्तेमाल किया गया, वह उस शक्ति का इस्तेमाल करने वाली अथॉरिटी की शक्ति को कमज़ोर या खत्म नहीं करेगा।"
इस मामले में अपीलकर्ता ज़िला सहकारी बैंक में असिस्टेंट इंजीनियर के तकनीकी पद पर कार्यरत था, उसे एडिशनल मैनेजर के पद पर प्रमोट किया गया। यह प्रमोशन रजिस्ट्रार द्वारा जारी सर्कुलर के बाद हुआ, जिसमें 'छत्तीसगढ़ ज़िला सहकारी केंद्रीय बैंक कर्मचारी सेवा (रोज़गार, शर्तें और काम की स्थितियां) नियम, 1982' के नियम 5(3)(a) को हटा दिया गया। इस नियम में तकनीकी पद वाले व्यक्ति के एडिशनल मैनेजर के पद पर प्रमोशन पर रोक थी।
प्रमोटेड पद पर लगभग तेरह साल तक काम करने के बाद अपीलकर्ता को उस पद से हटा दिया गया। उसे तब हटाया गया, जब रेस्पॉन्डेंट नंबर 5 ने उसके प्रमोशन को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की। रेस्पॉन्डेंट नंबर 5 एक प्रशासनिक पद पर था और ग्रेडेशन लिस्ट में अपीलकर्ता से नीचे था।
हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने अपीलकर्ता के एडिशनल मैनेजर के पद पर प्रमोशन को मंज़ूरी नहीं दी, क्योंकि तकनीकी पद वाले व्यक्ति के एडिशनल मैनेजर के पद पर प्रमोशन पर रोक लगाने वाले नियम को रजिस्ट्रार ने नियम में संशोधन करने के बजाय सिर्फ़ एक सर्कुलर जारी करके गलत तरीके से हटा दिया था।
अपीलकर्ता का प्रमोशन रद्द करने के सिंगल बेंच का फैसला डिवीज़न बेंच ने भी बरकरार रखा, जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
विवादित फैसला रद्द करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि सर्कुलर जारी करने के रजिस्ट्रार के फैसले में कोई गलती नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि चूंकि रजिस्ट्रार के पास उन नियमों को हटाने की शक्ति है, जो अपीलकर्ता जैसे तकनीकी पद वाले लोगों को एडिशनल मैनेजर के पद पर प्रमोट होने से रोकते, इसलिए जिस तरीके या रूप में उस शक्ति का इस्तेमाल किया गया, वह अपने आप में कार्रवाई को अमान्य करने का आधार नहीं हो सकता।
कोर्ट ने कहा,
“रजिस्ट्रार की कानूनी शक्तियों को देखते हुए नोटिफिकेशन को 'सर्कुलर' या कुछ और कहने से उसकी अहमियत पर कोई असर नहीं पड़ेगा।”
इसके बाद अपील मंज़ूर कर ली गई।
कोर्ट ने आदेश दिया,
“हमारे निष्कर्ष का नतीजा यह है कि अपीलकर्ता को (a) उसी पद और ओहदे पर वापस लाया जाएगा जिससे उसे हटाया गया; (b) उसकी सीनियरिटी सुरक्षित रखी जाएगी; (c) वह प्रमोशन के उन सभी फायदों का हकदार होगा जो कानून के अनुसार उसे मिलने चाहिए; और (d) वह 50% बकाया वेतन का भी हकदार होगा, जिसका भुगतान इस फ़ैसले की तारीख से दो महीने के भीतर किया जाना चाहिए, ऐसा न होने पर 6% सालाना की दर से ब्याज देना होगा।”
Cause Title: S. P. CHANDRAKAR VERSUS STATE OF CHHATTISGARH & ORS