अबू सलेम की समयपूर्व रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, एक सप्ताह में लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले के दोषी अबू सलेम की समयपूर्व रिहाई संबंधी याचिका पर सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने दोनों पक्षों को एक सप्ताह के भीतर अपनी लिखित दलीलें और संबंधित न्यायिक फैसले दाखिल करने का निर्देश दिया।
अबू सलेम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने दलील दी कि जेल में अच्छे आचरण के आधार पर मिली रिमिशन (सजा में छूट) और विचाराधीन कैदी (Undertrial) के रूप में बिताई गई अवधि को भी 25 वर्ष की सजा की गणना में शामिल किया जाना चाहिए।
उनका कहना था कि इन अवधियों को जोड़ने पर सलेम 25 वर्ष से अधिक, लगभग 26 वर्ष 9 महीने की अवधि पूरी कर चुका है, इसलिए उसे रिहा किया जाना चाहिए।
मल्होत्रा ने कहा कि टाडा अदालत ने भी विचाराधीन हिरासत की अवधि का लाभ देने का निर्देश दिया था, लेकिन जेल प्रशासन ने उसे लागू नहीं किया।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों के अनुसार अच्छे आचरण के आधार पर मिली रिमिशन को वास्तविक कारावास का हिस्सा माना जाता है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने वरिष्ठ अधिवक्ता से पूछा कि क्या वह इस मामले में विस्तृत फैसला चाहते हैं या केवल याचिका खारिज करने का आदेश।
इसके बाद पीठ ने फैसला सुरक्षित रखते हुए लिखित दलीलें दाखिल करने की अनुमति दे दी।
गौरतलब है कि बॉम्बे हाईकोर्ट अप्रैल 2025 में अबू सलेम की समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज कर चुका है।
हाईकोर्ट ने कहा था कि भारत ने प्रत्यर्पण के समय पुर्तगाल को जो आश्वासन दिया था, उसके अनुसार 25 वर्ष की अवधि नवंबर 2030 में पूरी होगी और अच्छे आचरण की रिमिशन से इस अवधि को कम नहीं किया जा सकता।