वार्ड का बंटवारा आबादी के आधार पर होना चाहिए, न कि वोटरों की संख्या के आधार पर: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-06-25 04:11 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने नगर निकाय के आगामी चुनावों में वार्ड बनाने के खिलाफ दायर याचिका खारिज की। कोर्ट का मानना ​​है कि वार्ड बनाने का मुख्य आधार वोटरों की संख्या नहीं, बल्कि आबादी है।

एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस शुभा मेहता की खंडपीठ ने कहा कि पूरी याचिका गुमराह करने वाली थी और यह गलत धारणा पर आधारित थी कि वार्ड वोटरों की संख्या के आधार पर तय किए जाते हैं।

बता दें, याचिकाकर्ता ने चुनाव के लिए ड्राफ्ट वोटर लिस्ट (मतदाता सूची) प्रकाशित होने के बाद यह याचिका दायर की, जिसमें वार्ड-वार वोटरों की वास्तविक संख्या का पता चला।

आरोप लगाया गया कि वार्डों के बीच वोटरों की संख्या में बहुत ज़्यादा अंतर है, जो तय सीमा +/- 10% से कहीं ज़्यादा है। तर्क दिया गया कि ऐसा अंतर अनुच्छेद 14 और 243R के तहत समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत का उल्लंघन है।

आगे यह भी तर्क दिया गया,

"...ज़्यादा वोटर आबादी वाले वार्डों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की बड़ी आबादी को शामिल किया गया, जबकि सामान्य श्रेणी की आबादी वाले वार्डों को छोटे वार्डों में रखा गया, जिससे कुछ वोटरों को दूसरों की तुलना में ज़्यादा प्रतिनिधित्व का महत्व मिल रहा है।"

तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 की धारा 9 का हवाला दिया और बताया कि नगरपालिका को वार्डों में बांटने की प्रक्रिया बताने वाले प्रावधान में "वोटर" शब्द का नहीं, बल्कि "आबादी" शब्द का इस्तेमाल किया गया।

इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने कहा कि किसी खास वार्ड की आबादी ज़्यादा हो सकती है, लेकिन वोटरों की संख्या कम हो सकती है।

"इसलिए याचिका का आधार - कि वार्ड वोटरों की संख्या के आधार पर तय किए जाने चाहिए - पूरी तरह से गलत धारणा पर आधारित है।"

इसके अनुसार, याचिका खारिज कर दी गई।

Title: Amrita Meena v the State of Rajasthan & Ors.

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