35 साल बाद मिला इंसाफ: करंट से महिला की मौत पर मुआवजा तीन गुना बढ़ाया, राजस्थान हाईकोर्ट ने बिजली विभाग को ठहराया जिम्मेदार
राजस्थान हाईकोर्ट ने करीब 35 वर्ष पुराने करंट लगने से मौत के मामले में पीड़ित परिवार को बड़ी राहत देते हुए मुआवजे की राशि लगभग 40 हजार रुपये से बढ़ाकर करीब 1.20 लाख रुपये की।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि बिजली जैसी खतरनाक वस्तु के प्रसारण से यदि किसी व्यक्ति की जान जाती है तो बिजली विभाग की पूर्ण जिम्मेदारी (सख्त दायित्व) बनती है और ऐसे मामलों में लापरवाही साबित करना भी आवश्यक नहीं है।
जस्टिस संदीप तनेजा की पीठ ने माना कि दुर्घटना वाले स्थान की बिजली लाइन लंबे समय से मरम्मत के अभाव में खराब थी। साथ ही ड्यूटी पर तैनात लाइनमैन भी घटना के समय अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय अनुपस्थित था। ऐसे में राज्य अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
मामला वर्ष 1991 का है। घटना वाली रात एक महिला घर से बाहर निकली तभी जमीन पर गिरे हुए जीवित बिजली के तार की चपेट में आ गई। करंट लगने पर उसकी चीख सुनकर एक पड़ोसी उसे बचाने दौड़ा, लेकिन वह भी करंट की चपेट में आ गया। इस हादसे में दोनों की मौत हो गई।
महिला की मौत के बाद परिजनों ने मुआवजे के लिए दीवानी वाद दायर किया था। निचली अदालत ने करीब 40 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
इससे असंतुष्ट होकर परिजनों ने मुआवजा बढ़ाने की मांग करते हुए अपील की जबकि राज्य ने मुआवजा दिए जाने के आदेश को ही चुनौती दी।
परिजनों की ओर से कहा गया कि बिजली लाइन लंबे समय से जर्जर थी और विभाग उसकी मरम्मत व रखरखाव पर ध्यान नहीं दे रहा। इसलिए यह हादसा विभाग और उसके कर्मचारियों की लापरवाही तथा निष्क्रियता का परिणाम था।
वहीं राज्य ने दलील दी कि नियमों के अनुसार बिजली लाइन का रखरखाव दीपावली और वर्षा ऋतु से पहले किया जाता था। घटना वाली रात तेज आंधी के कारण पेड़ गिर गए, जिससे बिजली का तार टूटकर जमीन पर आ गया।
सुबह सूचना मिलने पर बिजली आपूर्ति बंद कर दी गई। राज्य ने यह भी कहा कि महिला अंधेरे में लापरवाही से चल रही थी इसलिए दुर्घटना के लिए वह स्वयं भी जिम्मेदार थी और यह प्राकृतिक आपदा का मामला था।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि बिजली लाइन की लंबे समय से मरम्मत नहीं हुई और ड्यूटी पर तैनात लाइनमैन घटना की रात अपनी ड्यूटी पर मौजूद नहीं था। वहीं ऐसा कोई साक्ष्य भी नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि उस दिन आंधी के कारण बिजली का तार टूटा था।
अदालत ने कहा,
"रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट है कि बिजली लाइन की लंबे समय से मरम्मत नहीं हुई और लाइनमैन भी ड्यूटी पर मौजूद नहीं था। ऐसे में दुर्घटना को प्राकृतिक आपदा बताने की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती।"
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बिजली एक खतरनाक तत्व है और यदि उसके प्रसारण या रिसाव से किसी व्यक्ति को नुकसान होता है तो पूर्ण दायित्व के सिद्धांत के तहत बिजली विभाग जिम्मेदार होगा। ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष को विभाग की लापरवाही अलग से साबित करने की आवश्यकता नहीं होती।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में संशोधन करते हुए मुआवजा बढ़ाकर लगभग 1.20 लाख रुपये कर दिया।
साथ ही आदेश दिया कि यह राशि वर्ष 1991 में वाद दायर किए जाने की तारीख से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित पीड़ित परिवार को अदा की जाए।