नियमों में शामिल दिव्यांगता पर ही मिलेगी अनुकंपा नियुक्ति, अदालत नई श्रेणी नहीं जोड़ सकती: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-07-16 07:38 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने 75 प्रतिशत दिव्यांगता से ग्रस्त एक सरकारी कर्मचारी के बेटे को अनुकंपा नियुक्ति देने से इनकार करने के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति केवल उन्हीं दिव्यांगताओं के मामलों में दी जा सकती है, जिन्हें नियमों में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया। अदालत कानून में नई श्रेणी नहीं जोड़ सकती।

डॉ. जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने कहा कि कल्याणकारी कानूनों की उदार व्याख्या की जा सकती है, लेकिन अदालत विधायिका द्वारा जानबूझकर बाहर रखी गई श्रेणियों को न्यायिक व्याख्या के जरिए शामिल नहीं कर सकती।

कोर्ट ने कहा,

"नियमों से स्पष्ट है कि विधायिका ने अनुकंपा नियुक्ति का लाभ केवल उन्हीं मामलों तक सीमित रखा है, जहां ड्यूटी के दौरान दुर्घटना के कारण स्थायी पूर्ण दिव्यांगता हुई हो और वह भी केवल नियमों में सूचीबद्ध श्रेणियों में आती हो। यह एक सोची-समझी नीतिगत व्यवस्था है।"

मामले में याचिकाकर्ता के पिता राज्य बीमा एवं भविष्य निधि विभाग में निजी सहायक के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2023 में उन्हें ब्रेन स्ट्रोक आया, जिससे उनके शरीर का एक हिस्सा प्रभावित हो गया और उन्हें 75 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता हो गई। इसके बाद बेटे ने राजस्थान स्थायी पूर्ण दिव्यांग सरकारी सेवकों के आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति नियम, 2023 के तहत नौकरी की मांग की।

सरकार ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि कर्मचारी की दिव्यांगता नियमों में निर्धारित स्थायी पूर्ण दिव्यांगता की श्रेणी में नहीं आती।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि यह कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसकी व्यापक व्याख्या की जानी चाहिए। उसका कहना था कि सेवा के दौरान अत्यधिक तनाव के कारण आया ब्रेन स्ट्रोक भी दुर्घटना माना जाना चाहिए।

राज्य सरकार ने कहा कि नियमों में केवल ड्यूटी के दौरान दुर्घटना से उत्पन्न आठ प्रकार की विशिष्ट दिव्यांगताओं को ही अनुकंपा नियुक्ति का आधार बनाया गया। ब्रेन स्ट्रोक से हुई दिव्यांगता इनमें शामिल नहीं है।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दलील स्वीकार करते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति कोई मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि कानून के तहत दी जाने वाली विशेष रियायत है, इसलिए इसका लाभ केवल नियमों में निर्धारित परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि नियमों में प्रयुक्त परिभाषा समावेशी नहीं बल्कि पूर्ण है। इसमें "शामिल है" जैसे शब्द या कोई ऐसा प्रावधान नहीं है, जिससे अन्य प्रकार की दिव्यांगताओं को भी इसमें जोड़ा जा सके।

पीठ ने कहा,

"याचिकाकर्ता के पिता की दिव्यांगता निस्संदेह गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन वह नियमों में वर्णित किसी भी श्रेणी में नहीं आती। यदि अदालत इसे शामिल कर ले तो यह विधायिका द्वारा जानबूझकर तय की गई व्यवस्था को बदलने जैसा होगा।"

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि वह याचिकाकर्ता और उसके परिवार की कठिनाइयों के प्रति संवेदनशील है, लेकिन कानून के दायरे से बाहर जाकर राहत नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर अपील खारिज की गई।

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