राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर बिल पर की गई टिप्पणियां हटाईं, जारी किया संशोधित आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से जुड़े संशोधन कानून पर पहले की गई अपनी टिप्पणियों को हटाते हुए आदेश का संशोधित संस्करण जारी किया।
जस्टिस अरुण मोंगा ने 30 मार्च के आदेश में ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन विधेयक, 2026 पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के आत्म-पहचान के अधिकार को सीमित कर सकता है। हालांकि अब अदालत ने उन टिप्पणियों को हटाकर नया स्पष्टीकरण जारी किया।
संशोधित आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि मूल फैसला उस समय लागू कानूनी स्थिति को ध्यान में रखकर दिया गया और राज्य सरकार का दायित्व है कि वह अदालत के निर्देशों के अनुसार नीतियां बनाते समय वर्तमान कानून के दायरे में ही काम करे।
यह मामला एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की याचिका से जुड़ा था, जिसमें राजस्थान सरकार की 2023 की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में शामिल किया गया।
हाईकोर्ट ने अपने मूल आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ हो रहे भेदभाव और सामाजिक पिछड़ेपन का अध्ययन करने के लिए एक समिति गठित करे और आवश्यक सुधारात्मक कदम सुझाए।
साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि सार्वजनिक रोजगार और शिक्षा के मामलों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को 3 प्रतिशत अतिरिक्त अंक दिए जाएं।
अब संशोधित आदेश के जरिए अदालत ने यह स्पष्ट किया कि नीतिगत फैसले बनाते समय राज्य को मौजूदा कानून के अनुरूप ही कार्य करना होगा और पहले की गई संवेदनशील टिप्पणियों को आदेश से हटा दिया गया।