रिकॉर्ड में पहले से मौजूद दस्तावेजों को प्रदर्शन के रूप में दर्ज करने से किसी पक्ष को नुकसान नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-07-09 13:10 GMT

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई दस्तावेज पहले से ही न्यायालय के रिकॉर्ड का हिस्सा है, तो उसे बाद में प्रदर्शन (एक्ज़िबिट) के रूप में दर्ज करने की अनुमति देने से दूसरे पक्ष को कोई वास्तविक नुकसान नहीं होता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल तकनीकी या लिपिकीय त्रुटियों के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया को बाधित नहीं किया जाना चाहिए।

जस्टिस फरजंद अली ने किराया अधिकरण के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें बेदखली याचिका में संशोधन की अनुमति दी गई थी।

यह संशोधन डाक रसीद और प्राप्ति पावती (एडी कार्ड) का उल्लेख जोड़ने के लिए किया गया था। ये दस्तावेज मूल याचिका के साथ पहले ही दाखिल किए जा चुके थे लेकिन लिपिकीय भूल के कारण उनका उल्लेख याचिका में नहीं हो पाया था।

कोर्ट ने कहा कि इस संशोधन से न तो बेदखली की कार्यवाही का स्वरूप बदला और न ही कोई नया कारण जोड़ा गया। साथ ही, इससे मकान मालिक को अपने पक्ष में नया साक्ष्य जोड़कर मामला मजबूत करने का अवसर भी नहीं मिला।

मामले में किरायेदार के खिलाफ बेदखली की कार्यवाही लंबित थी। इसी दौरान मकान मालिक ने दो आवेदन दाखिल किए। पहले आवेदन में पहले से रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों को प्रदर्श के रूप में अंकित करने की अनुमति मांगी गई, जबकि दूसरे आवेदन में याचिका के एक अनुच्छेद में उन दस्तावेजों का उल्लेख जोड़ने के लिए संशोधन की मांग की गई।

किरायेदार ने इन आवेदनों का विरोध करते हुए कहा कि इन्हें कार्यवाही के काफी आगे बढ़ जाने के बाद दाखिल किया गया। उसका तर्क था कि इससे याचिका का स्वरूप बदल जाएगा और उसके अधिकार प्रभावित होंगे।

हालांकि, निचली अदालत ने यह कहते हुए दोनों आवेदन स्वीकार कर लिए कि संबंधित दस्तावेज पहले से रिकॉर्ड पर मौजूद हैं और प्रदर्श अंकित न होना केवल प्रक्रिया संबंधी त्रुटि है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संशोधन से कोई नया तथ्य या दावा नहीं जोड़ा जा रहा है। साथ ही, किरायेदार को संशोधित जवाब दाखिल करने की भी अनुमति दी गई, ताकि दोनों पक्षों के हित सुरक्षित रहें।

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले से सहमति जताते हुए कहा,

"रिकॉर्ड का हिस्सा बने दस्तावेजों को प्रदर्श के रूप में अंकित करने की अनुमति देने से प्रतिवादी को नया साक्ष्य पेश कर अपना मामला मजबूत करने का अवसर नहीं मिलता। यह केवल पहले से दाखिल दस्तावेजों से जुड़ी अनजाने में हुई त्रुटि को नियमित करने की प्रक्रिया है। प्रक्रिया संबंधी कानून को तकनीकी या लिपिकीय गलतियों के आधार पर वास्तविक न्याय में बाधा डालने का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता।"

कोर्ट ने माना कि किरायेदार यह साबित नहीं कर सका कि इस आदेश से उसे कोई वास्तविक या गंभीर नुकसान हुआ है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज की।

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