राजस्थान भूमि राजस्व संशोधन अधिनियम पर उठे संवैधानिक सवाल, हाइकोर्ट ने जारी किया नोटिस
राजस्थान हाइकोर्ट ने राजस्थान भूमि राजस्व (संशोधन एवं वैधीकरण) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर राज्य सरकार और विशेष रूप से राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम को नोटिस जारी किया।
एक्टिंग चीफ जस्टिस संज़ीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि संशोधन अधिनियम, 2025 के तहत जो धारा 100ए जोड़ी गई, उसके अंतर्गत की गई सभी कार्रवाइयाँ अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी।
जनहित याचिका में आरोप लगाया गया कि रीको ने अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निजी पक्षों को भूमि उपयोग परिवर्तन की अनुमति, निर्माण स्वीकृति, समयावधि विस्तार तथा पूरक पट्टा विलेख निष्पादित किए। याचिकाकर्ता का कहना है कि पूर्व में हाइकोर्ट स्पष्ट रूप से यह कह चुका है कि रीको को ऐसे अधिकार प्राप्त नहीं हैं।
याचिका में यह भी कहा गया कि संबंधित मामले में हाइकोर्ट ने रूपांतरण अनुमति रद्द करते हुए यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया इसके बावजूद रीको ने निर्माण गतिविधियों को जारी रहने दिया और निजी पक्ष के पक्ष में पूरक पट्टा विलेख भी निष्पादित कर दिया।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि जब न्यायालयों ने इन कार्रवाइयों को अवैध ठहराया, तब वर्ष 2025 का संशोधन अधिनियम लाकर धारा 100ए जोड़ी गई। इस प्रावधान के तहत रीको को उपलब्ध कराई गई भूमि को पूर्व प्रभाव से उसके नाम निहित मान लिया गया और उसे भूमि निस्तारण, भूमि उपयोग परिवर्तन, स्वीकृति और अनुमतियाँ देने जैसे व्यापक अधिकार प्रदान कर दिए गए।
धारा 100ए(2) के माध्यम से रीको की पूर्व की सभी कार्रवाइयों को, चाहे वे न्यायिक आदेशों, वैधानिक प्रावधानों या प्रक्रिया संबंधी त्रुटियों के विपरीत क्यों न हों, पूर्व प्रभाव से वैध घोषित कर दिया गया।
याचिका में कहा गया कि यह संशोधन शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत को प्रभावित करता है और न्यायिक निर्णयों को निष्प्रभावी करने का प्रयास है। याचिकाकर्ता के अनुसार, “यह संशोधन एक वास्तविक नियामक उपाय नहीं, बल्कि विधायी शक्ति का आड़ लेकर न्यायिक निर्णयों को निष्प्रभावी करने का प्रयास है, जिससे विधि के शासन को आघात पहुंचता है।”
यह भी तर्क दिया गया कि जिन शक्तियों को संशोधन के जरिए रीको को प्रदान किया गया, वे मूलतः वैधानिक और संवैधानिक निकायों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। रीको कंपनी अधिनियम के अंतर्गत गठित एक कंपनी है और वह किसी विधिक प्राधिकरण की श्रेणी में नहीं आती।
याचिका में निर्माण गतिविधियों पर रोक, अभिलेखों के संरक्षण, वित्तीय प्रभावों के आकलन तथा रीको और संबंधित अधिकारियों की कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच की मांग की गई।
हाइकोर्ट ने सभी पक्षों को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट किया कि संशोधन अधिनियम के तहत की गई सभी कार्रवाइयाँ मामले के अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी। मामले की अगली सुनवाई नियत तिथि पर होगी।