पोस्टमार्टम रिपोर्ट से तय नहीं होगी मृतक की उम्र, पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस को मिलेगी प्राथमिकता: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-05-14 06:21 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी मृतक की उम्र तय करने के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर नहीं, बल्कि पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे सरकारी दस्तावेजों पर भरोसा किया जाएगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज उम्र केवल अनुमानित होती है, जबकि सरकारी एजेंसियों द्वारा जारी दस्तावेज अधिक विश्वसनीय माने जाएंगे।

जस्टिस संदीप तनेजा ने यह टिप्पणी मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों की सुनवाई के दौरान की।

मामले में हाईकोर्ट ने माना कि दुर्घटना कार चालक की लापरवाही और तेज रफ्तार के कारण हुई थी। साथ ही ट्रक चालक की भी लापरवाही सामने आई, जिसके चलते दोनों वाहनों को दुर्घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। इसी आधार पर बीमा दावे की जिम्मेदारी कार और ट्रक की बीमा कंपनियों के बीच 75:25 के अनुपात में बांटी गई, जिसे हाईकोर्ट ने सही माना।

दावा करने वालों की ओर से कहा गया कि मृतक की आय का निर्धारण अनुमान के आधार पर किया गया, जबकि आयकर रिटर्न में दर्शाई गई सबसे अधिक आय को आधार बनाया जाना चाहिए था। इसके अलावा मृतक की उम्र 48 वर्ष पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर मानी गई, जबकि ड्राइविंग लाइसेंस और पैन कार्ड में उसकी उम्र 41 वर्ष दर्ज थी।

हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा,

“पोस्टमार्टम रिपोर्ट का उद्देश्य चोटों की प्रकृति और मृत्यु के कारण का पता लगाना होता है। इसमें दर्ज उम्र शारीरिक परीक्षण के आधार पर अनुमानित होती है और इसे सटीक नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर ड्राइविंग लाइसेंस और पैन कार्ड सरकारी एजेंसियों द्वारा जारी दस्तावेज हैं, जिनकी विश्वसनीयता अधिक है।”

अदालत ने यह भी कहा कि मुआवजे की गणना करते समय मृतक की वार्षिक आय उसी वित्तीय वर्ष के आयकर रिटर्न के आधार पर तय की जानी चाहिए, जिसमें उसकी सबसे अधिक आय दिखाई गई हो। इस संबंध में हाइकोर्ट ने निधि भार्गव बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया।

इसके अलावा, हाईकोर्ट ने टी.ओ. एंथनी बनाम करवरनन मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी दुर्घटना में दो या अधिक लोगों की लापरवाही से किसी व्यक्ति की मौत होती है, तो यह “संयुक्त लापरवाही” का मामला माना जाएगा। ऐसे मामलों में सभी जिम्मेदार पक्ष दावे की राशि चुकाने के लिए संयुक्त रूप से उत्तरदायी होंगे और पीड़ित पक्ष किसी एक या सभी से मुआवजा मांग सकता है।

अंततः हाईकोर्ट ने दावा करने वालों को मिलने वाले मुआवजे का दोबारा आंकलन करते हुए करीब 15 लाख रुपये की बढ़ोतरी की।

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