बुजुर्ग माता-पिता की सुरक्षा के लिए बेटे-बहू को घर से बेदखल करना सही: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-05-15 10:07 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने सीनियर सिटीजन्स के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि बुजुर्ग माता-पिता की गरिमा और शांतिपूर्ण जीवन की रक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर बेटे, बहू या अन्य रिश्तेदारों को संपत्ति से बेदखल किया जा सकता है।

जस्टिस समीर जैन की पीठ ने सीनियर सिटीजन दंपति और उनके बेटे-बहू द्वारा दायर याचिका खारिज की। यह याचिका 80 वर्ष से अधिक उम्र के माता-पिता द्वारा संपत्ति से बेदखली के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई।

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि बुजुर्ग माता-पिता को बेटे, बहू और पोते की ओर से कथित तौर पर प्रताड़ना, धमकियों और अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ रहा था। इससे उनके शांतिपूर्ण जीवन और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन हो रहा था।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि विवादित संपत्ति भले ही मां के नाम पर हो, लेकिन उसमें बेटे ने काफी निवेश किया था। यह भी कहा गया कि पिता रिटायर सरकारी कर्मचारी हैं और पेंशन प्राप्त करते हैं, जबकि पोते पर अपने वृद्ध माता-पिता की जिम्मेदारी भी है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यदि उन्हें घर से बेदखल किया गया तो उनकी आजीविका और निजी जीवन पर गंभीर असर पड़ेगा।

वहीं बुजुर्ग माता-पिता की ओर से अदालत को बताया गया कि उन्हें लगातार अपमानजनक व्यवहार, झगड़ों और धमकियों का सामना करना पड़ा, जिससे घर का माहौल भय और असुरक्षा से भर गया।

हाईकोर्ट ने एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर, बेंगलुरु अर्बन जिला मामले का हवाला देते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य बुजुर्गों की सुरक्षा, गरिमा और शांतिपूर्ण जीवन सुनिश्चित करना है।

अदालत ने कहा,

“जहां सीनियर सिटीजन्स की देखभाल और सुरक्षा के दायित्व का उल्लंघन होता है, वहां सक्षम प्राधिकारी बुजुर्गों के शांतिपूर्ण और गरिमापूर्ण जीवन की रक्षा के लिए बच्चों या रिश्तेदारों को बेदखल करने का आदेश दे सकते हैं।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत उसकी निगरानी संबंधी शक्तियों का इस्तेमाल सीमित दायरे में किया जाता है और अदालत अपीलीय अदालत की तरह दोबारा साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं कर सकती।

अदालत ने पक्षों के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद, बुजुर्ग माता-पिता की उम्र और उनकी आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखा। अदालत ने यह भी कहा कि पोता युवा और सक्षम व्यक्ति है।

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि मजिस्ट्रेट द्वारा पारित बेदखली आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या मनमानी नहीं है।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने याचिका खारिज की।

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