मामलों की सूचीबद्धता में देरी पर रजिस्ट्री के खिलाफ अवमानना कार्यवाही समाप्त: राजस्थान हाइकोर्ट का फैसला

Update: 2026-03-10 10:40 GMT

राजस्थान हाइकोर्ट ने मामलों की सूचीबद्धता को लेकर उठी शिकायतों के आधार पर रजिस्ट्री अधिकारियों के खिलाफ शुरू की गई स्वतः संज्ञान अवमानना कार्यवाही समाप्त की।

अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि कोई मामला तय तारीख पर सूचीबद्ध नहीं हुआ, अवमानना कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं है।

जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया।

अदालत ने इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि केवल किसी मामले के सूचीबद्ध न होने के आधार पर अवमानना याचिका दायर करना रजिस्ट्री पर दबाव बनाने की कोशिश है, जिसकी कड़ी निंदा की गई।

दरअसल कुछ वकीलों ने शिकायत की थी कि अदालत द्वारा अगली तारीख तय करने के बावजूद कई मामलों को उस दिन सूची में शामिल नहीं किया जा रहा था।

उनका कहना था कि इससे विशेष रूप से बाहर से आने वाले वकीलों को काफी परेशानी होती है और जमानत याचिकाओं में यह समस्या और गंभीर हो जाती है।

इन शिकायतों को देखते हुए हाइकोर्ट ने पहले टिप्पणी की थी कि अदालत द्वारा तय तारीख के बावजूद मामलों का सूचीबद्ध न होना न्याय प्रशासन में बाधा के समान हो सकता है। इसी आधार पर रजिस्ट्री अधिकारियों को अवमानना का नोटिस जारी किया गया।

बाद में जब मामले की सुनवाई हुई और रिकॉर्ड तथा दायर हलफनामों की जांच की गई, तब न्यायमित्र ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले मनोज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला दिया।

इस फैसले में कहा गया था कि केवल इस वजह से कि कोई मामला अदालत द्वारा तय तारीख पर सूचीबद्ध नहीं हुआ, अदालत के सचिव या रजिस्ट्रार के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती, क्योंकि कई व्यावहारिक कारणों से सूचीबद्धता में बदलाव हो सकता है।

इस पृष्ठभूमि में हाइकोर्ट ने रिकॉर्ड, अधिकारियों द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण और उनकी बिना शर्त माफी को ध्यान में रखते हुए कहा कि अवमानना कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं होगा।

अदालत ने इसी आधार पर स्वतः संज्ञान अवमानना कार्यवाही को समाप्त करते हुए मामले का निस्तारण किया।

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