गलत तरीके से अनिवार्य रिटायरमेंट पर भेजे गए कर्मचारी को पूरा बकाया वेतन मिलेगा: नो वर्क, नो पे दलील पर राजस्थान हाइकोर्ट सख्त
राजस्थान हाइकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए उस कर्मचारी को अनिवार्य रिटायरमेंट की अवधि का पूरा वेतन और भत्ते देने का आदेश दिया, जिसे बिना ठोस आधार के सेवा से बाहर कर दिया गया था। कोर्ट ने साफ कहा कि जब कर्मचारी को काम करने से ही रोका गया हो तो उस पर नो वर्क, नो पे का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता।
जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकल पीठ ने यह आदेश उस याचिका पर सुनाया, जिसमें एक सरकारी कर्मचारी ने वेतन न दिए जाने को चुनौती दी थी। कर्मचारी को वर्ष 2006 में अनिवार्य रिटायरमेंट दी गई थी। बाद में 2014 में अपीलीय प्राधिकरण ने यह आदेश रद्द किया। साथ ही यह कहते हुए उस अवधि का वेतन देने से इनकार किया गया कि कर्मचारी ने उस दौरान कोई काम नहीं किया।
कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि अपीलीय प्राधिकरण ने स्वयं यह माना कि कर्मचारी का सेवा रिकॉर्ड इतना खराब नहीं था कि उसे डेड वुड मानकर अनिवार्य रिटायरमेंट दी जाए। जब रिटायरमेंट का आदेश ही गलत पाया गया तो वेतन न देने का कोई औचित्य नहीं बचता।
जस्टिस भटनागर ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले शोभा राम रतूड़ी बनाम हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम लिमिटेड का हवाला देते हुए कहा,
“अपीलकर्ता सभी परिणामी लाभों का हकदार था। उसकी सेवाओं का उपयोग न करना पूरी तरह से नियोक्ता की गलती थी। यदि उसे सेवा में बने रहने दिया जाता तो वह अपनी जिम्मेदारियां निभाने के लिए तैयार था। जब उसे काम करने से ही रोका गया तो अब 'नो वर्क, नो पे' के आधार पर वेतन से इनकार नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामला भी उसी सिद्धांत पर पूरी तरह लागू होता है क्योंकि कर्मचारी की अनिवार्य रिटायरमेंट बिना किसी ठोस और वैध कारण के की गई।
इन परिस्थितियों में राजस्थान हाइकोर्ट ने कर्मचारी को उसकी अनिवार्य रिटायरमेंट की पूरी अवधि का वेतन और अन्य भत्ते देने का निर्देश दिया। साथ ही राज्य सरकार को आदेश दिया गया कि तीन महीने के भीतर समस्त बकाया राशि का भुगतान किया जाए।
इस फैसले के साथ कोर्ट ने याचिका का निपटारा किया।