एक ही आदेश के खिलाफ दो समानांतर उपाय नहीं अपना सकता पक्षकार: राजस्थान हाइकोर्ट
राजस्थान हाइकोर्ट ने कहा कि किसी आदेश या निर्णय के खिलाफ एक ही समय में दो समानांतर कानूनी उपाय अपनाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस आधार पर एक पुनर्विचार याचिका खारिज की।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड ने कहा कि जब कोई पक्षकार उपाय चुन लेता है तो उसे उसी के साथ आगे बढ़ना होगा। यदि उस उपाय से राहत नहीं मिलती तो वह बीच में दूसरा उपाय अपनाकर दो नावों पर सवार” नहीं हो सकता।
अदालत ने कहा,
“दो समानांतर उपाय अपनाकर याचिकाकर्ता दो नावों में सवार होने का प्रयास कर रहा है, जिसे अनुमति नहीं दी जा सकती। एक ही निर्णय के खिलाफ एक साथ दो कानूनी उपाय अपनाना कानून और अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।”
पूरा मामला
मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ एक सेल डीड के आधार पर धन वसूली के लिए सारांश वाद दायर किया गया। निष्पादन अदालत ने वाद का फैसला वादी के पक्ष में किया।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने उसी डिक्री के खिलाफ दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 47 के तहत आपत्तियां दायर कीं, जिन्हें खारिज कर दिया गया। इस आदेश के खिलाफ उसने हाइकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।
प्रतिवादी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि उसी डिक्री के खिलाफ याचिकाकर्ता पहले ही वैधानिक अपील दायर कर चुका है, जो अदालत में विचाराधीन है। इसलिए समानांतर रूप से दूसरा उपाय अपनाना उचित नहीं है।
अदालत की टिप्पणी
हाइकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता पहले ही अपील दाखिल कर चुका था, इसलिए वह समानांतर रूप से दूसरा उपाय नहीं अपना सकता। अदालत ने कहा कि भले ही तकनीकी रूप से कई उपाय उपलब्ध हों, लेकिन एक ही कारण के लिए उन्हें एक साथ अपनाना स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने इस संदर्भ में लैटिन सिद्धांत “नेमो डेबेट बिस वेक्सारी प्रो उना एट एआडेम काउसा” का उल्लेख किया, जिसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति को एक ही कारण के लिए दो बार परेशान नहीं किया जाना चाहिए।
अंततः हाइकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जब वैधानिक अपील पहले से लंबित है तो धारा 47 के तहत आपत्तियों का सहारा लेना उचित नहीं था। इसी आधार पर अदालत ने पुनरीक्षण याचिका खारिज की।