राजस्थान हाइकोर्ट का निर्देश: वित्तीय संकट का बहाना बनाकर कर्मचारी के वैध बकाये नहीं रोके जा सकते
राजस्थान हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सड़क परिवहन निगम की वित्तीय कठिनाइयां किसी कर्मचारी के वैध बकाये को रोकने का आधार नहीं बन सकतीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी श्रमिक के वैधानिक अधिकारों से केवल इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता कि निगम के पास पर्याप्त धनराशि नहीं है।
जस्टिस अशोक कुमार जैन की पीठ रिटायर कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने लगभग 13 वर्षों तक साप्ताहिक अवकाश के बदले देय राशि का भुगतान न होने पर अदालत का दरवाजा खटखटाया।
अदालत ने कहा कि यदि राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (RSRTC) कुप्रबंधन या खराब प्रशासन के कारण वित्तीय संकट का सामना कर रहा है तो इसका खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगतना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि चालक, परिचालक, तकनीकी और सहायक कर्मचारी ही सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की रीढ़ हैं, इसलिए केवल वित्तीय कठिनाई का हवाला देकर समझौते के तहत देय राशि से बचा नहीं जा सकता।
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता ने वर्ष 2014 में स्वैच्छिक रिटायरमेंट लिया था। इसके बाद उनके और निगम के बीच विवाद उत्पन्न हुआ, जिसका निस्तारण वर्ष 2015 में लोक अदालत में हुआ। समझौते के तहत निगम ने नौ माह के भीतर सभी बकाया भुगतान करने का आश्वासन दिया था।
याचिकाकर्ता का कहना था कि वर्ष 1998 से 2011 तक के साप्ताहिक अवकाश के बदले देय राशि को छोड़कर अन्य सभी भुगतान कर दिए गए लेकिन उक्त राशि अब तक नहीं दी गई। इसी के चलते उन्होंने हाइकोर्ट में याचिका दायर की।
सभी पक्षकारों को सुनने के बाद हाइकोर्ट ने पाया कि निगम की ओर से देयता को लेकर कोई ठोस बचाव प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि जब दायित्व स्वीकार है तो भुगतान में देरी उचित नहीं ठहराई जा सकती।
अंततः अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए राज्य को निर्देश दिया कि राष्ट्रीय लोक अदालत में हुए समझौते के अनुसार बकाया राशि का भुगतान 6 प्रतिशत ब्याज सहित किया जाए।