निजी स्वार्थ छिपाकर दायर की जनहित याचिका: राजस्थान हाइकोर्ट सख्त, भविष्य में PIL पर रोक, 25 लाख जुर्माने पर विचार
राजस्थान हाइकोर्ट ने जनहित याचिका (PIL) के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए याचिकाकर्ता को भविष्य में कोई भी PIL दायर करने से रोक दिया। अदालत ने यह भी पूछा है कि उसके खिलाफ कार्यवाही क्यों न की जाए और 25 लाख रुपये का भारी जुर्माना क्यों न लगाया जाए।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने यह आदेश उस समय दिया, जब सुनवाई के दौरान सामने आया कि याचिकाकर्ता का मामले में निजी हित जुड़ा हुआ है।
याचिका में राज्यभर में राष्ट्रीय राजमार्गों, रिंग रोड और अन्य सड़कों पर कथित अवैध धर्मकांटे और वे- ब्रिज (तौल केंद्र) हटाने, उनकी जांच और जवाबदेही तय करने की मांग की गई।
हालांकि, सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता का परिवार खुद खनन और वे- ब्रिज संचालन के व्यवसाय से जुड़ा है। अदालत को बताया गया कि यदि इन तौल केंद्रों का संचालन प्रभावित होता है तो इससे याचिकाकर्ता के परिवार को आर्थिक लाभ हो सकता है, क्योंकि खनिज ले जाने वाले वाहन रॉयल्टी भुगतान से बच सकते हैं।
अदालत के सवालों पर यह भी स्पष्ट हुआ कि याचिकाकर्ता के पिता खनन कार्य में लगे हैं और उसका भाई भी वे- ब्रिज संचालन से जुड़ा है।
इन तथ्यों के आधार पर हाइकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला पूरी तरह जनहित का नहीं बल्कि निजी या व्यावसायिक हित से प्रेरित प्रतीत होता है।
अदालत ने टिप्पणी की,
“याचिकाकर्ता ने जनहित का सहारा लेकर अपने निजी हित को आगे बढ़ाने की कोशिश की, जो न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”
हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता ने अपने निजी हित की जानकारी पहले ही दी होती तो स्थिति अलग हो सकती थी लेकिन जानकारी छिपाने के कारण उसकी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं।
अदालत ने याचिकाकर्ता का नाम PIL में बदलकर प्रतिवादी के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया और मामले को जनहित से जुड़ा मानते हुए स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) के रूप में आगे सुनवाई जारी रखने का फैसला किया।
साथ ही याचिकाकर्ता को नोटिस जारी कर यह स्पष्ट करने को कहा गया कि उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए।