सहन करना सहमति नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- आर्थिक और सामाजिक मजबूरियों में साथ रहना क्रूरता को खत्म नहीं करता
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि कई महिलाएं आर्थिक निर्भरता, सामाजिक दबाव, बच्चों की जिम्मेदारी, रहने की जगह की कमी और बदनामी के डर के कारण प्रताड़नापूर्ण वैवाहिक संबंधों में रहने को मजबूर होती हैं। ऐसे में केवल यह तथ्य कि पति-पत्नी कुछ वर्षों तक एक ही घर में रहे इससे क्रूरता के आरोप स्वतः खत्म नहीं हो जाते।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने कहा,
“एक ही घर में रहना हमेशा सौहार्दपूर्ण वैवाहिक जीवन का प्रमाण नहीं होता। कई बार यह प्रतिकूल परिस्थितियों में मजबूरी में सहन किए गए जीवन का प्रतीक होता है।”
अदालत ने स्पष्ट कहा,
“यदि पत्नी इसलिए घर में रह रही है, क्योंकि उसके पास कहीं और जाने की जगह नहीं है तो इसे इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि उसके साथ कोई क्रूरता नहीं हुई। अक्सर सहनशीलता को सहमति या माफी समझ लिया जाता है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि मानसिक क्रूरता केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है बल्कि ऐसे हर व्यवहार को इसमें शामिल किया जाएगा, जो वैवाहिक जीवन को असहनीय बना दे। अदालत ने फैमिली कोर्ट की उस सोच पर भी सवाल उठाया, जिसमें पति-पत्नी के साथ रहने को अत्यधिक महत्व दिया गया, जबकि पत्नी को हुई मानसिक पीड़ा को नजरअंदाज कर दिया गया।
यह मामला उस अपील से जुड़ा था जिसमें फैमिली कोर्ट ने महिला की तलाक याचिका खारिज की थी। महिला ने अपने पति और ससुराल पक्ष पर क्रूरता, प्रताड़ना, लगातार दहेज मांगने और घर से निकाल देने के आरोप लगाए।
वहीं पति ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि पत्नी ने स्वेच्छा से उसे छोड़ा। उसका दावा था कि उसकी बहन ने पत्नी के भाई के साथ आटा-साटा विवाह निभाने से इनकार किया, जिसके बाद पत्नी ने प्रतिशोध में घर छोड़ दिया।
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट आटा-साटा विवाह विवाद से प्रभावित हो गई और उसने वैवाहिक संबंधों में हुई क्रूरता के वास्तविक पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि दोनों पक्षों के बीच गंभीर मतभेद और मानसिक प्रताड़ना थी, जिसने पत्नी को वैवाहिक घर छोड़ने पर मजबूर किया।
खंडपीठ ने कहा,
“पत्नी के घर छोड़ने को स्वेच्छा कहना उस मानसिक दबाव और मजबूरी को नजरअंदाज करना होगा, जिसने उसके लिए साथ रहना असंभव बना दिया था। कोई महिला वर्षों तक भावनात्मक उपेक्षा और मानसिक दबाव झेलने के बाद सामान्य वैवाहिक जीवन बनाए रखने की उम्मीद नहीं की जा सकती।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी द्वारा भरण-पोषण और अन्य कानूनी राहतों के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना दबाव बनाने का तरीका नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि ये कदम अपने बुनियादी अधिकारों की रक्षा के लिए उठाए गए आवश्यक कानूनी उपाय थे।
अदालत ने कहा,
“ऐसी कानूनी कार्यवाहियां दुर्भावना नहीं, बल्कि प्रताड़नापूर्ण माहौल में अपने अधिकार सुरक्षित करने का प्रयास होती हैं।”
अंत में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को त्रुटिपूर्ण बताते हुए उसे रद्द किया और महिला की तलाक याचिका स्वीकार की।