दैनिक मज़दूरों की हकीकत पर राजस्थान हाइकोर्ट की सख़्त टिप्पणी, 26 दिन के वेतन फ़ॉर्मूले को बताया अव्यावहारिक
दैनिक मज़दूरी पर काम करने वाले श्रमिकों की ज़मीनी स्थिति को स्वीकार करते हुए राजस्थान हाइकोर्ट ने कहा कि यह मान लेना पूरी तरह गलत है कि हर दैनिक मज़दूर को सप्ताह में एक दिन का सवेतन अवकाश मिलता है। कोर्ट ने साफ़ कहा कि ऐसे मज़दूर बिना वेतन छुट्टी लेने की स्थिति में नहीं होते। इसलिए उनकी मज़दूरी की गणना 26 दिन के बजाय 30 दिन के आधार पर होनी चाहिए।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि दैनिक मज़दूरों की वास्तविक परिस्थितियों को नज़रअंदाज़ कर बनाए गए सरकारी फ़ॉर्मूले में सुधार की आवश्यकता है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,
“दैनिक मज़दूरी पर काम करने वाले श्रमिक प्रायः हाथ से मुंह तक की स्थिति में जीवन यापन करते हैं। ऐसे में यदि वे साप्ताहिक अवकाश लेते हैं और उस दिन का भुगतान नहीं मिलता तो उन्हें गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।”
हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि श्रम मंत्रालय और श्रम विभाग की ओर से जारी अधिसूचना जिसमें 26 दिन के आधार पर न्यूनतम मज़दूरी तय की गई, इस धारणा पर आधारित है कि श्रमिक सप्ताह में एक दिन अवकाश पर रहते हैं। जबकि हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।
कोर्ट ने कहा,
“श्रम कानून भले ही सप्ताह में एक दिन अवकाश का प्रावधान करते हों लेकिन दुर्भाग्यवश दैनिक मज़दूरों को उस दिन का कोई भुगतान नहीं मिलता। ऐसे में उनके पास सातों दिन काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।”
यह मामला एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा था, जिसमें दावाकर्ता के पैर में 13 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता आई थी। दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा तय मुआवज़े को चुनौती देते हुए अपील दायर की गई थी।
अपीलकर्ता की ओर से दो दलीलें दी गईं। पहली यह कि वह बेलदार के रूप में कार्यरत था और उसे अकुशल श्रमिक मानना गलत है। दूसरी दलील यह थी कि मुआवज़े की गणना के लिए न्यूनतम मज़दूरी 26 दिनों के बजाय 30 दिनों के आधार पर की जानी चाहिए।
हाइकोर्ट ने पहली दलील को श्रम विभाग की अधिसूचनाओं के आधार पर ख़ारिज किया, जिनमें बेलदार को अकुशल श्रमिक की श्रेणी में रखा गया। हालांकि दूसरी दलील को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,
“किसी भी दृष्टि से यह मानना सही नहीं है कि हर दैनिक मज़दूर महीने में चार दिन काम नहीं करता। ऐसे श्रमिकों के पास बिना वेतन अवकाश लेने का कोई अवकाश नहीं होता।”
इसी आधार पर हाइकोर्ट ने मुआवज़े की राशि बढ़ाते हुए न्यूनतम मज़दूरी की गणना 30 दिनों के अनुसार करने का निर्देश दिया। साथ ही कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार के संबंधित विभागों को आदेश की प्रति भेजने के निर्देश दिए ताकि दैनिक मज़दूरों की न्यूनतम मज़दूरी से जुड़ी अधिसूचनाओं में आवश्यक संशोधन किया जा सके।
इस प्रकार, अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मामले का निस्तारण कर दिया गया।