राजस्थान हाईकोर्ट ने 37 साल बाद आपराधिक मामले में अमान्य समझौते के बावजूद दोबारा सुनवाई से इनकार किया, कार्यवाही रद्द की

Update: 2026-03-19 15:20 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में ट्रायल कोर्ट द्वारा एक व्यक्ति को बरी किए जाने के फैसले को सही ठहराया। यह फैसला एक समझौते के आधार पर दिया गया, भले ही वह समझौता अमान्य था।

ऐसा करते हुए कोर्ट ने दोबारा सुनवाई का आदेश देने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि 37 साल बीत जाने के बाद मामले को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेजना न्याय के हित में नहीं होगा।

भले ही बरी किए जाने का फैसला कानून के पूरी तरह से अनुरूप नहीं था। फिर भी कोर्ट ने अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए आरोपी के खिलाफ चल रही कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने यह फैसला इस बात को ध्यान में रखते हुए लिया कि यह घटना 1989 की थी।

जस्टिस फरजंद अली की बेंच मजिस्ट्रेट के 1990 में दिए गए आदेश के खिलाफ राज्य सरकार की आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रही थी। उस आदेश में एक समझौते के आधार पर आरोपी को बरी कर दिया गया।

राज्य सरकार का तर्क था कि जिस व्यक्ति ने समझौता किया था, वह CrPC की धारा 320 के तहत ऐसा करने के लिए सक्षम नहीं था। इसलिए ऐसे समझौते के आधार पर आरोपी को बरी नहीं किया जा सकता था।

एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि दूसरे व्यक्ति ने उसकी बकरियों को मार डाला था। ये बकरियां शिकायतकर्ता के भाई की थीं, लेकिन घटना के समय वे शिकायतकर्ता के खेत में चर रही थीं।

शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच एक समझौता हुआ, जिसके आधार पर आरोपी को बरी कर दिया गया।

हालांकि, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि चूंकि शिकायतकर्ता बकरियों का मालिक नहीं था, इसलिए वह CrPC की धारा 320 के तहत समझौता नहीं कर सकता था।

तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने राज्य सरकार के तर्क से सहमति जताई।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की:

"...इस तथ्य को देखते हुए कि यह घटना वर्ष 1989 में हुई थी। यह मामला विशेष रूप से मजिस्ट्रेट की कोर्ट में ही सुनवाई योग्य है (जिसमें अधिकतम सज़ा पांच साल से ज़्यादा नहीं होती), 37 साल बीत जाने के बाद मामले को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेजना - मेरी राय में - न्याय के हित में नहीं होगा।"

कोर्ट ने फैसला दिया कि इस मामले को दोबारा खोलना न्याय के उद्देश्य को आगे नहीं बढ़ाएगा। इसके बजाय, यह केवल एक पुराने विवाद को फिर से ज़िंदा करेगा और दोनों पक्षकारों को अनावश्यक परेशानी और लंबी कानूनी लड़ाई में उलझा देगा।

इस पृष्ठभूमि में यह माना गया कि आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना पूरी तरह से अनुचित था और न्यायालय अपने अंतर्निहित क्षेत्राधिकार का प्रयोग करके इस मामले को समाप्त करने का हकदार था, जिससे न्याय की बेहतर पूर्ति होती।

तदनुसार, अपील खारिज की गई।

Title: State of Rajasthan v Moola Ram

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