लिखित पावर ऑफ अटॉर्नी को मौखिक रूप से रद्द या संशोधित नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-04-27 08:22 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि लिखित रूप में दी गई पावर ऑफ अटॉर्नी (PoA) को मौखिक बयान के आधार पर न तो रद्द किया जा सकता है और न ही उसमें कोई बदलाव किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे किसी भी परिवर्तन, संशोधन या निरस्तीकरण के लिए लिखित दस्तावेज आवश्यक है।

जस्टिस रेखा बोरणा ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई अनुबंध या दस्तावेज कानूनन लिखित रूप में आवश्यक है और उसे लिखित रूप में निष्पादित किया गया है तो उसके प्रावधानों को मौखिक रूप से बदला नहीं जा सकता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले एस. सक्तिवेल बनाम एम. वेणुगोपाल पिल्लई (2000) 7 SCC 104 का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में मौखिक साक्ष्य स्वीकार्य नहीं है।

मामला

मामला एक भूमि विवाद से जुड़ा है, जिसमें वादी ने बिक्री विलेख निरस्त करने और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए दीवानी वाद दायर किया। वादी ने वर्ष 2012 में अपनी भूमि के विकास के लिए डेवलपर्स के पक्ष में विकास समझौता किया और चंपा देवी तथा अनिल कौशिक के नाम पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित की।

समझौते के अनुसार डेवलपर्स को कृषि भूमि को आवासीय उपयोग में परिवर्तित करना था और विकास कार्यों का खर्च वहन करना था, जिसके बदले कुल 27 बीघा भूमि में से 13 बीघा भूमि उन्हें हस्तांतरित की जानी थी।

वादी का आरोप था कि वर्ष 2021 तक कोई विकास कार्य नहीं हुआ, इसलिए उसने जनवरी 2022 में मौखिक रूप से PoA रद्द की थी। इसके बावजूद PoA धारक ने 31 अक्टूबर, 2023 को सेल डीड निष्पादित कर दिया। इसके बाद वादी ने 2 नवंबर, 2023 को औपचारिक रूप से पंजीकृत नोटिस जारी कर PoA निरस्त की।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि वादी स्वयं स्वीकार कर रहा है कि उसने 5 दिसंबर 2012 को पावर ऑफ अटॉर्नी और विकास समझौता निष्पादित किया था। ऐसे में मौखिक निरस्तीकरण का दावा कानूनन महत्वहीन है।

अदालत ने कहा,

“यदि कोई अधिकार लिखित दस्तावेज के माध्यम से हस्तांतरित किया गया है तो उसका निरस्तीकरण भी लिखित रूप में ही होना चाहिए और इसकी सूचना उस पक्ष को दी जानी चाहिए, जिसके पक्ष में अधिकार दिया गया।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सेल डीड की तिथि 3 नवंबर 2023 मानकर त्रुटि की। वास्तविकता यह है कि सेल डीड 31 अक्टूबर, 2023 को निष्पादित हुआ था, जबकि 3 नवंबर 2023 को केवल उसका पंजीकरण हुआ था।

अदालत ने माना कि 31 अक्टूबर, 2023 तक पावर ऑफ अटॉर्नी प्रभावी थी, इसलिए उस दिन निष्पादित सेल डीड वैध है।

हाईकोर्ट ने वादी की याचिका फिजूल और उत्पीड़नकारी मुकदमा बताते हुए आदेश 7 नियम 11 सीपीसी के तहत वाद खारिज किया और याचिकाकर्ता की अर्जी स्वीकार की।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस फैसले के माध्यम से पुनः स्पष्ट किया कि लिखित कानूनी दस्तावेजों का प्रभाव केवल लिखित प्रक्रिया से ही समाप्त या परिवर्तित किया जा सकता है, मौखिक दावों से नहीं।

Tags:    

Similar News