जांच के दौरान गंभीर, गैर-जमानती अपराध जोड़ने से IO द्वारा दी गई जमानत रद्द करना सही: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-01-13 15:13 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान गंभीर और गैर-जमानती अपराध जोड़े जाने के बाद IO द्वारा आरोपी को दी गई जमानत रद्द करना सही था।

जस्टिस अनूप कुमार धंड की बेंच ने स्पेशल जज (डकैती प्रभावित क्षेत्र) के फैसले को बरकरार रखा, जिसने याचिकाकर्ता की जमानत रद्द कर दी थी। यह फैसला एक उच्च रैंक के अधिकारी द्वारा चोट रिपोर्ट की दोबारा जांच के आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ गैर-जमानती अपराध (गंभीर चोट पहुंचाना) का आरोप जोड़े जाने के बाद लिया गया।

यह याचिका उन याचिकाकर्ताओं ने दायर की, जिन पर कुछ लोगों को चोट पहुंचाने का आरोप था, और जिन्हें शुरू में जमानत मिल गई थी। हालांकि, बाद में मामले की दोबारा जांच की गई और घायल व्यक्ति को लगी चोटों और अपराध की गंभीरता को देखते हुए गंभीर चोट पहुंचाने का अपराध भी दर्ज अपराध में जोड़ा गया, जो गैर-जमानती था।

इसके आधार पर याचिकाकर्ताओं को दी गई जमानत रद्द करने के लिए आवेदन दायर किया गया, जिसे स्वीकार कर लिया गया। इस आदेश को कोर्ट में चुनौती दी गई। यह तर्क दिया गया कि जब IO ने चोटों को सामान्य और अपराधों को जमानती पाया था तो IO के पास गैर-जमानती अपराध जोड़ने का कोई कारण नहीं था।

इसके विपरीत, राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि भले ही शुरू में अपराध जमानती पाए गए, लेकिन एक उच्च अधिकारी द्वारा चोट रिपोर्ट की दोबारा जांच के आधार पर अपराध में अतिरिक्त धारा जोड़ी गई।

दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि दोबारा जांच में यह पता चला कि घायल व्यक्ति की कुछ चोटें उसके सिर पर बार-बार किए गए वार का नतीजा थीं, जो शरीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्पेशल जज ने जमानत रद्द करने के लिए सभी तथ्यों को ध्यान में रखा।

अब्दुल गफूर बनाम राजस्थान राज्य के मामले में कोऑर्डिनेट बेंच के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि जमानती अपराधों के तहत आरोपी को जमानत का फायदा जारी नहीं रह सकता और गंभीर और गैर-जमानती अपराध जोड़े जाने पर यह रद्द हो जाता है।

इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने कहा,

"यह कानून का तय सिद्धांत है कि इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर द्वारा आरोपी व्यक्तियों को दी गई जमानत का फायदा जांच के दौरान ज़्यादा गंभीर और गैर-जमानती अपराध जोड़े जाने पर रद्द किया जा सकता है, इसलिए इन परिस्थितियों में, इस कोर्ट को निचली अदालत द्वारा दिए गए आदेश में कोई गलती नहीं दिखती है।"

इसलिए याचिका खारिज कर दी गई और स्पेशल जज का आदेश बरकरार रखा गया।

Title: Dinesh & Ors. v State of Rajasthan

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