आत्महत्या के लिए उकसाने का इरादा न होने पर "ज़हर खाकर मर जाओ" जैसी कोई बात कहना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

Update: 2026-03-10 04:51 GMT

पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महिला को बरी किया, जिसे अपनी सौतेली बेटी को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराया गया था। कोर्ट ने कहा कि शक सबूत की जगह नहीं ले सकता और अगर आत्महत्या के लिए उकसाने का कोई इरादा न हो तो कही गई छोटी-मोटी बातें कानून के तहत आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं मानी जाएंगी।

जस्टिस रूपिंदरजीत चहल ने कहा,

"अगर बहस के लिए यह मान भी लिया जाए कि मौत आत्महत्या थी तो भी अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि IPC की धारा 107 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने की बात साबित होती है।"

अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि मृतक सुषमा, जिसकी उम्र लगभग 16 साल थी और जो गुगन राम की पहली शादी से हुई बेटी थी, अपनी माँ की मौत के बाद अपने ननिहाल वालों के साथ रह रही थी। अप्रैल 2003 में, वह अपने पिता और सौतेली माँ के साथ गाँव नांगल सिरोही में रहने लगी।

आरोप लगाया गया कि 6 जुलाई, 2003 को लड़की ने अपने ननिहाल वालों को फ़ोन करके बताया कि उसके पिता उसके साथ गलत हरकतें कर रहे हैं और उसे अपनी जान का खतरा है। अगले दिन रिश्तेदारों को पता चला कि उसकी मौत हो गई और उसके शव का अंतिम संस्कार भी किया जा चुका है। 12 जुलाई 2003 को IPC की धारा 306, 354 और 201 के तहत एक FIR दर्ज की गई।

ट्रायल कोर्ट ने मुख्य रूप से शिकायतकर्ता और रिश्तेदारों की गवाही पर भरोसा किया, जिन्होंने फ़ोन पर हुई बातचीत के बारे में बताया। फिर दोनों आरोपियों को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराया।

हालांकि, हाईकोर्ट को अभियोजन पक्ष के मामले में कई कमियां मिलीं। सबसे पहले, कोर्ट ने पाया कि कोई पोस्टमार्टम नहीं किया गया। फोरेंसिक लैब में भेजे गए राख और अवशेषों में ज़हर होने का कोई सबूत नहीं मिला। मेडिकल या वैज्ञानिक सबूतों की कमी के कारण अभियोजन पक्ष यह पक्के तौर पर साबित नहीं कर पाया कि मौत आत्महत्या थी।

कोर्ट ने यह भी बताया कि शिकायतकर्ता ने खुद ही क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान यह माना कि उसे नहीं पता कि मृतक की मौत कैसे हुई और यह भी हो सकता है कि उसने ज़हर खाया हो या उसकी हत्या की गई हो।

जस्टिस चहल ने कहा कि IPC की धारा 306 के तहत किसी मामले में यह साबित करना कि मृतक ने आत्महत्या की थी, एक बुनियादी ज़रूरत है, जिसे सिर्फ़ शक के आधार पर नहीं माना जा सकता। दूसरी बात, कोर्ट ने पाया कि सोमटा देवी के खिलाफ़ एकमात्र आरोप यह था कि जब मृतक ने अपने पिता के बर्ताव के बारे में शिकायत की, तो सौतेली माँ ने कथित तौर पर उससे कहा कि अगर उसे शर्म आती है, तो वह "ज़हर खाकर मर जाए"।

इस बयान को सच भी मान लिया जाए तो भी कोर्ट ने माना कि यह ज़्यादा से ज़्यादा एक मामूली टिप्पणी थी, जिसमें उकसाने का अपराध साबित करने के लिए ज़रूरी 'मेंस रिया' (अपराधिक इरादा) या सीधा संबंध नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों—संजू @ संजय सिंह सेंगर बनाम मध्य प्रदेश राज्य, उदे सिंह बनाम हरियाणा राज्य और जियो वर्गीस बनाम राजस्थान राज्य—पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि IPC की धारा 306 के तहत सज़ा के लिए उकसाने या जान-बूझकर मदद करने का स्पष्ट सबूत ज़रूरी है, जिसने पीड़ित को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया हो।

कोर्ट ने FIR दर्ज कराने में छह दिनों की बिना किसी स्पष्टीकरण के हुई देरी पर भी गौर किया और टिप्पणी की कि ऐसी देरी से यह संभावना बढ़ जाती है कि मामले में सोच-समझकर फेरबदल या मनगढ़ंत बातें जोड़ी गई हों।

मेडिकल सबूतों की कमी, आत्महत्या साबित करने में विफलता, आत्महत्या से ठीक पहले उकसाने के सबूतों की कमी और रिश्तेदारों को फ़ोन पर सूचना देने के संबंध में बचाव पक्ष के विश्वसनीय सबूतों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष सोमटा देवी का अपराध 'उचित संदेह से परे' साबित करने में विफल रहा है।

तदनुसार, कोर्ट ने सोमता देवी की सज़ा और दोषसिद्धि रद्द की और उन्हें सभी आरोपों से बरी करते हुए 'संदेह का लाभ' प्रदान किया।

Title: GUGAN RAM AND ANR. v. STATE OF HARYANA

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