प्राइवेट ट्रस्ट के साथ सर्विस विवाद रिट अधिकार क्षेत्र के तहत सुनवाई योग्य नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने 'द ट्रिब्यून ट्रस्ट' के कर्मचारी द्वारा दायर रिट याचिका खारिज की। कोर्ट ने माना कि किसी निजी संस्था के साथ पूरी तरह से संविदात्मक रोज़गार से उत्पन्न होने वाले सर्विस विवाद संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र के दायरे में नहीं आते।
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा,
"प्रतिवादी-ट्रस्ट एक स्वतंत्र संस्था है, जिसके अपने नियम हैं, जो उसके कर्मचारियों की सेवा के आंतरिक विनियमन के लिए बनाए गए हैं। इसके अलावा... किसी भी वैधानिक नियम के अभाव में प्रतिवादी-ट्रस्ट और उसके कर्मचारियों के बीच संबंध की प्रकृति निजी नियोक्ता और निजी कर्मचारी जैसी है, क्योंकि इसमें कोई सार्वजनिक कानून तत्व शामिल नहीं है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता द्वारा प्रतिवादी-ट्रस्ट के जिस कार्य को चुनौती दी गई, वह उसकी सेवा समाप्ति के संबंध में निजी संविदात्मक विवाद की प्रकृति का है। रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जो यह दर्शाता हो कि चुनौती दिए गए कार्य में कोई ऐसा सार्वजनिक तत्व है, जिसके लिए इस कोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।"
यह याचिका पूजा तनेजा द्वारा दायर की गई, जिसमें 28 मई, 2024 के सेवा समाप्ति आदेश को चुनौती दी गई। याचिकाकर्ता 2007 से 'द ट्रिब्यून ट्रस्ट' के साथ काम कर रही थी। अंततः उसे AGM (R) के पद पर पदोन्नत किया गया। एक विज्ञापन एजेंसी को अनुचित वित्तीय लाभ पहुंचाने और ट्रस्ट को वित्तीय नुकसान पहुंचाने के आरोपों पर उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई। एक जांच के बाद उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ट्रस्ट सार्वजनिक कार्य करता है और उसे अनुच्छेद 12 के दायरे में आना चाहिए। सेवा समाप्ति दुर्भावनापूर्ण है और इसका उद्देश्य उसे पदोन्नति से वंचित करना है। उक्त आरोप साबित नहीं हुए। यहां तक कि प्रबंधन के गवाहों ने भी उसके आचरण का समर्थन किया। यह कार्रवाई निष्पक्षता और उचित प्रक्रिया के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि ट्रस्ट एक निजी संस्था है और अनुच्छेद 12 के तहत "राज्य" नहीं है। याचिकाकर्ता संविदात्मक कर्मचारी थी और सेवा समाप्ति संविदात्मक शर्तों के अनुसार ही की गई।
उन्होंने आगे कहा कि यह विवाद प्रकृति में पूरी तरह से निजी है, इसमें कोई सार्वजनिक कानून तत्व नहीं है। इसका उचित उपचार दीवानी अदालत में उपलब्ध है। सुप्रीम कोर्ट के पहले के फ़ैसलों पर भरोसा करते हुए—जिनमें सेंट मैरीज़ एजुकेशन सोसाइटी बनाम राजेंद्र प्रसाद भार्गव और आर्मी वेलफ़ेयर एजुकेशन सोसाइटी बनाम सुनील कुमार शर्मा के मामले शामिल हैं—कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि निजी संस्थाओं के ख़िलाफ़ रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब वे सार्वजनिक कर्तव्यों का पालन कर रही हों, और जिस कार्रवाई पर सवाल उठाया गया, उसका ऐसे कर्तव्य से सीधा संबंध हो।
बेंच ने कहा कि पूरी तरह से अनुबंध-आधारित संबंधों से पैदा होने वाले रोज़गार संबंधी विवाद—जिनके पीछे कोई क़ानूनी आधार न हो—रिट अधिकार क्षेत्र के दायरे में नहीं आते। साथ ही, निजी संस्थाओं के आंतरिक सेवा नियमों में कोई क़ानूनी ताक़त नहीं होती।
कोर्ट ने यह भी दोहराया कि भले ही कोई संस्थान सार्वजनिक कार्य करता हो, लेकिन जो कर्मचारी क़ानूनी दायरे से बाहर हैं, उनकी रोज़गार की शर्तों से जुड़े विवाद निजी क़ानून के दायरे में ही आते हैं।
Title: Pooja Taneja v. The Tribune Trust and others